नई दिल्ली,(ईएमएस)। मध्य भारत के लाल गलियारे में दशकों पुराने माओवादी आंदोलन को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगने वाला है। प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) की सबसे ताकतवर इकाइयों में से एक – महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ (एमएमसी) स्पेशल जोनल कमेटी ने औपचारिक रूप से घोषणा की है कि उसके सैकड़ों कैडर 1 जनवरी 2026 तक एक साथ हथियार डालकर मुख्यधारा में लौटने को तैयार हैं। शर्त सिर्फ एक – तीनों राज्य सरकारें स्पष्ट सुरक्षा गारंटी दें और पूरी तरह पारदर्शी पुनर्वास प्रक्रिया चलाएं। एमएमसी के प्रवक्ता ‘अनंत’द्वारा जारी तीन पन्नों के पत्र में तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए कहा गया है, हम व्यक्तिगत या बिखरे हुए सरेंडर नहीं चाहते। हमारा पूरा जोन एक साथ, एक दिन, एक झंडे तले सम्मानजनक वापसी चाहता है। 1 जनवरी 2026 हमारी अंतिम और गैर-परक्राम्य तारीख है। पत्र में साफ लिखा है कि यदि सरकारें 1 जनवरी 2026 तक सभी सैन्य ऑपरेशन रोक देंगी, तो एमएमसी के कैडर भी उसी दिन से सभी सशस्त्र और संगठनात्मक गतिविधियां स्थायी रूप से बंद कर देंगे। संगठन ने इसे कायरता नहीं, बदले हुए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय हालात में जनता के हित में लिया गया सामरिक निर्णय बताया है। यह पेशकश ऐसे समय आई है जब केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक पूरे देश से वामपंथी उग्रवाद खत्म करने का लक्ष्य रखा है। पिछले ढाई साल में सुरक्षा बलों ने 270 से ज्यादा माओवादियों को मार गिराया है, 1225 ने आत्मसमर्पण किया है और 680 गिरफ्तार हुए हैं, जिनमें कई सेंट्रल कमेटी सदस्य भी शामिल हैं। रायपुर में अभी कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की मौजूदगी में डीजीपी-आईजीपी सम्मेलन हुआ था, जिसमें नक्सल उन्मूलन को अंतिम चरण बताया गया था। एमएमसी ने पिछली सरेंडर नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पत्र में कहा गया है कि कई सरेंडर करने वाले कैडरों और उनके परिवारों को न तो सुरक्षा मिली, न नौकरी और न ही सम्मानजनक जीवन। इसलिए अब कागजी वादों पर भरोसा नहीं। संगठन ने छत्तीसगढ़ की ‘पोना मार्गेम’ योजना को आधार बनाने की इच्छा जताई है, बशर्ते उसे तीनों राज्यों में एकसमान लागू किया जाए। संपर्क के लिए एमएमसी ने एक खास रेडियो फ्रीक्वेंसी 435.715 एमएचजेड जारी की है, जिस पर हर रोज सुबह 11:00 से 11:15 बजे तक बात हो सकती है। संगठन ने अपने कैडरों से अपील की है कि कोई जल्दबाजी या भावुकाव में व्यक्तिगत सरेंडर न करें, बल्कि नेतृत्व के सामूहिक निर्देश का इंतजार करें। तीनों राज्य सरकारें और केंद्रीय गृह मंत्रालय अभी आधिकारिक तौर पर चुप हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सामूहिक आत्मसमर्पण सफल हुआ, तो यह 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद सबसे बड़ा एकमुश्त सरेंडर होगा और मध्य भारत का लाल गलियारा हमेशा के लिए इतिहास बन जाएगा। वीरेंद्र/ईएमएस/29नवंबर2025 -------------------------------------