राष्ट्रीय
29-Nov-2025


नई दिल्ली(ईएमएस)। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं लोक सभा सांसद डॉ संबित पात्रा ने जमीयत उलेमा- ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी के देशविरोधी बयान पर जोरदार हमला करते हुए कहा कि, मौलाना महमूद मदनी द्वारा भोपाल में आयोजित सम्मेलन में दिया गया भाषण न केवल भड़काऊ है बल्कि देश को विभाजन की ओर ले जाने की कुचेष्टा दर्शाता है। मौलाना महमूद मदनी का यह कहना कि ‘जुल्म होने पर जिहाद होगा, अब जिहाद होना चाहिए’ अत्यंत अनुचित है क्योंकि जिहाद के नाम पर भारतवर्ष ही नहीं पूरे विश्व में आतंक और हिंसा फैलाई गई है और ऐसे संदर्भ में भारत में जिहाद का उल्लेख गैर जिम्मेदाराना वयान है। यह भी अत्यंत चिंताजनक है कि मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि मुसलमानों के लिए जिहाद पवित्र है और जहां उन्हें जुल्म दिखे वहां जिहाद करना चाहिए। ऐसे शब्द भारत की मूल भावना और भारत के मूल मंत्र ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ पर प्रहार करते हैं। इस प्रकार की अभिव्यक्ति अनुचित है और इसकी घोर निंदा की जाती है। मौलाना महमूद मदनी द्वारा यह कहना कि भारत सरकार के दबाव में अदालतें काम करती हैं और सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं को सर्वोच्च कहलाने का कोई अधिकार नहीं है, यह न्यायपालिका पर सीधा प्रहार है। उनके यह प्रश्न कि सर्वोच्च न्यायालय तीन तलाक पर सुनवाई कैसे करता है, मंदिर मस्जिद के विषय पर सुनवाई कैसे करता है और हमारे मामलों को स्वीकार कैसे करता है, स्पष्ट रूप से न्यायालय की गरिमा को कमतर दिखाने का प्रयास है। मौलाना महमूद मदनी का यह कहना कि सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं को सर्वोच्च कहलाने का अधिकार नहीं है, अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और पूरी तरह अस्वीकार्य है। सर्वोच्च न्यायालय के विरुद्ध मौलाना महमूद मदनी द्वारा की गई टिप्पणी अत्यंत गंभीर है और सर्वोच्च न्यायालय स्वयं संज्ञान लेने का अधिकार रखता है क्योंकि यदि कोई साधारण नागरिक भी इस प्रकार की टिप्पणी करे तो सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान ले सकता है। इतना बड़ा नेता यदि इस प्रकार का वक्तव्य देकर लोगों को बरगलाने और सर्वोच्च न्यायालय के विरोध में उकसाने का प्रयास करे तो यह न्यायालय की गरिमा को क्षति पहुंचाने वाला है और इस पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जाना अपेक्षित है। सर्वोच्च न्यायालय किसी भी मामले की सुनवाई जनता द्वारा प्रस्तुत याचिका के आधार पर करता है और वहां न हिंदू का मामला होता है न मुसलमान का, न्याय बराबरी से मिलता है और सर्वोच्च न्यायालय कभी भेदभाव नहीं करता। अत्यंत दुख का विषय है कि मौलाना महमूद मदनी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि ‘मुर्दा कौमें झुक जाती हैं और जिंदा कौमें आवाज उठाती हैं और आंदोलन करती हैं’ और उदाहरण देते हुए वंदे मातरम का उल्लेख किया कि वंदे मातरम बुलवाया जाता है और मुर्दा कौमें झुक जाती हैं जबकि जिंदा कौमें नहीं झुकतीं। यह विचार देश की एकता, सम्मान और संवैधानिक मूल्यों को आहत करने वाला है। मौलाना महमूद मदनी को स्मरण रखना चाहिए कि वंदे मातरम किसी धर्म का प्रतीक नहीं बल्कि इस मिट्टी की सुगंध है और हिंदुस्तान की आत्मा का स्वर है। वंदे मातरम मां भारती की वह वाणी है जिसके उद्गार पर असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने प्राण न्योछावर किए ताकि देश स्वतंत्र वातावरण में श्वास ले सके। यह वर्ष वंदे मातरम के 150वीं वर्षगांठ का वर्ष है। वंदे मातरम को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में लिखा और वर्ष 1876 में रवींद्रनाथ टैगोर ने उसे स्वरबद्ध किया तथा वर्ष 1950 में इसे राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया। आज जब पूरे देश में वंदे मातरम का मान बढ़ रहा है और उसका आदर किया जा रहा है तब जिंदा कौम और मुर्दा कौम का उल्लेख कर वंदे मातरम के प्रति भड़काने का प्रयास मौलाना महमूद मदनी और उनके साथियों की विभाजनकारी नीति को उजागर करता है। ईएमएस/ 29 नवम्बर, 2025