अपने पुराने बेस को मजबूत करने की तैयारी -पुराने जातीय समीकरण मुस्लिम, दलित, भूमिहार-ब्राह्मण पर लौटेगी पार्टी नई दिल्ली/पटना(ईएमएस)। बिहार में करारी हार के बाद कांग्रेस अपनी पुरानी रणनीति पर वापस लौटेगी। कांग्रेस सूत्रों की मानें तो पार्टी बिहार में महागठबंधन से अलग हो सकती है। राजद के साथ गठबंधन खत्म कर सकती है। इसकी आधिकारिक घोषणा नए साल में होने के आसार हैं। बिहार की हार के बाद दिल्ली में हुई समीक्षा बैठक में कांग्रेस की टॉप लीडरशिप ने सभी हारे हुए कैंडिडेट से बंद कमरे में मुलाकात की। राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल ने नेताओं के साथ कई राउंड की बैठक की। बैठक में शामिल बिहार कांग्रेस के एक बड़े नेता ने बताया कि अब पार्टी बिहार में नए सिरे से अपना बेस तैयार करेगी। इसका संकेत राहुल गांधी की तरफ से मिल गया है। बैठक में इस बात पर भी लगभग सहमति बनी है कि बिहार में ईबीसी-ओबीसी वर्ग का लोभ छोडक़र पार्टी को अपने पुराने और आधार वोट वर्ग पर ही काम करना चाहिए। इस चुनाव में पार्टी का पूरा फोकस नीतीश कुमार के कोर वोट बैंक ईबीसी को साधने का था, लेकिन पार्टी को इससे फायदा की जगह नुकसान हुआ है। अब टॉप लीडरशिप ने इस बात के संकेत दिए हैं कि पार्टी अपने पुराने समीकरण मुस्लिम, दलित और भूमिहार, ब्राह्मण पर फोकस करे। इसी वोट बैंक के सहारे पार्टी बिहार में लंबे समय तक सत्ता में रही थी। बिहार की जातीय सर्वे के मुताबिक, राज्य में मुस्लिम करीब 18 प्रतिशत, दलित 19.65 प्रतिशत, ब्राह्मण 3.66 प्रतिशत और भूमिहार की आबादी 2.86 प्रतिशत है। इस लिहाज से देखें तो ये कुल आबादी का करीब 44 प्रतिशत हैं, जिसकी राजनीति अब बिहार में कांग्रेस करना चाह रही है। संगठन के फेरबदल से पार्टी इसकी शुरुआत कर सकती है। प्रदेश नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं होगा हार के बाद प्रदेश स्तर के नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी को बदलने की डिमांड की थी, लेकिन सेंट्रल लीडरशिप ने स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल प्रदेश नेतृत्व में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं होगा। इन्हें चुनाव से चंद महीने पहले जिम्मेदारी दी गई थी इसलिए हार का पूरा ठीकरा इनके ऊपर नहीं फोड़ा जा सकता है। बल्कि अब इन्हें काम करने की पूरी आजादी दी जा सकती है। संगठन में नए चेहरे को मिल सकता है मौका कांग्रेस राज्य में संगठन को नए सिरे से तैयार करेगी। इसमें युवाओं को ज्यादा मौके मिल सकते हैं। प्रदेश से लेकर प्रखंड स्तर तक नए सिरे से पदाधिकारियों की घोषणा की जाएगी। सभी पार्टियों ने विधायक दल के नेता का चयन कर लिया है, लेकिन कांग्रेस में ये प्रक्रिया अभी तक बाकी है। सूत्रों की मानें तो यहां भी नई लीडरशिप को मौका मिल सकता है। 2029 से पहले से बिहार में आत्मनिर्भर होने की कोशिश बिहार प्रदेश के संगठन से जुड़े बड़े नेता ने बताया कि पार्टी अब लोकसभा चुनाव से पहले अपनी जमीन मजबूत करना चाहती है। अगले 4 साल तक बिहार में कोई चुनाव नहीं है। ऐसे में पार्टी के पास भरपूर मौका है कि वो क्रछ्वष्ठ के पिछलग्गू का टैग हटाकर आत्मनिर्भर बन जाए। ऐसे भी 2014 के बाद से पार्टी को बिहार में राजद के साथ होने से फायदा कम नुकसान ज्यादा हुआ है। पप्पू से दूरी बना सकता है आलाकमान कांग्रेस और पप्पू यादव के बीच रिश्ता क्या है, इसे समझने में हर कोई फेल हैं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पप्पू यादव का वैचारिक सपोर्ट किया। विधानसभा चुनाव से पहले पप्पू से दूरी बनाने वाले राहुल गांधी चुनाव के वक्त मंच साझा करते दिखे। लेकिन इनके साथ आने से पार्टी को ज्यादा नुकसान हुआ। कांग्रेस पप्पू यादव के लोकसभा इलाके पूर्णिया में सबसे बुरी हार हारी। विनोद उपाध्याय / 29 नवम्बर, 2025