पाकिस्तान के संविधान में बदलाव ठीक नहीं, इससे सेना बेलगाम, अदालत कमजोर होगी न्यूयॉर्क(ईएमएस)। पाकिस्तान में हुए संविधान संशोधन को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने चिंता जताई है। यूएन ह्यूमन राइट एजेंसी के हाई कमिश्नर वोल्कर टर्क ने चेतावनी दी है कि 27वां संविधान संशोधन न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है। टर्क ने बयान जारी कर कहा कि यह बदलाव उन जरूरी कानूनी नियमों (रूल ऑफ लॉ) को भी कमजोर कर सकता है, जिनसे देश में कानून-व्यवस्था बनी रहती है। पाकिस्तान में 12 नवंबर को संसद ने सेना की शक्तियों को बढ़ाने और सुप्रीम कोर्ट की ताकत कम करने वाले 27वें संवैधानिक संशोधन को मंजूरी दी थी। इस दौरान संविधान के 48 अनुच्छेदों में बदलाव किए गए थे। अदालत पर राजनीति का असर बढ़ेगा टर्क ने चिंता जताई कि संविधान संशोधन पिछले साल पारित 26वें संविधान संशोधन की तरह बिना जरूरी चर्चा के बिना ही पास कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि ये बदलाव सिस्टम में इतनी बड़ी फेरबदल करते हैं कि अदालतों पर राजनीति का असर पडऩे का खतरा बढ़ जाता है। टर्क ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का एक मुख्य पैमाना यह है कि उस पर सरकार का दखल न हो। अगर यह सुरक्षा खत्म हो गई, तो अदालतें मानवाधिकारों की रक्षा नहीं कर पाएंगी और न ही कानून को सभी पर बराबरी से लागू कर पाएंगी। टर्क ने संशोधन में शामिल उस प्रावधान पर भी चिंता जताई जिसमें राष्ट्रपति और शीर्ष सैन्य नेतृत्व को आजीवन आपराधिक मामलों से छूट दी गई है। उन्होंने कहा कि यह बात जवाबदेही के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। संविधान संशोधन पर फिर से विचार करने की अपील टर्क ने पाकिस्तान से कहा कि वह इस संशोधन की समीक्षा करे और ऐसे बदलाव करे, जिनसे देश की संस्थाएं मजबूत हों, कमजोर नहीं। संयुक्त राष्ट्र की यह चिंता ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान की सेना में बड़े बदलाव हो रहे हैं। सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने 27 नवंबर को देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज के रूप में कार्यभार संभाला है। यह नया पद भी इसी संवैधानिक संशोधन के तहत बनाया गया है। आर्मी के हाथों में परमाणु कमांड 27वें संविधान संशोधन का एक बहुत खास हिस्सा है नेशनल स्ट्रैटजिक कमांड का गठन। यह कमांड पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और मिसाइल सिस्टम की निगरानी और नियंत्रण करेगी। अब तक यह जिम्मेदारी नेशनल कमांड अथॉरिटी के पास थी, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते थे, लेकिन अब से हृस्ष्ट के पास इसकी जिम्मेदारी हो जाएगी। एनएससी का कमांडर भले ही प्रधानमंत्री की मंजूरी से नियुक्त होगा, लेकिन यह नियुक्ति सेना प्रमुख की सिफारिश पर ही होगी। सबसे जरूरी यह पद सिर्फ आर्मी के अफसर को ही दिया जाएगा। इससे देश के परमाणु हथियारों का नियंत्रण अब पूरी तरह सेना के हाथ में चला जाएगा। विनोद उपाध्याय / 29 नवम्बर, 2025