राज्य
29-Nov-2025


भारतीय ज्ञान परम्परा पुस्तक बनी अन्य प्रांतों के लिए प्रेरक भोपाल(ईएमएस)। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को देश में सर्वप्रथम लागू करने का गौरव प्राप्त हुआ है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव का मानना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय लोकाचार में निहित एक ऐसी शिक्षा प्रणाली प्रदान करती है, जो राष्ट्र -निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देती है। वर्ष 2047 तक राष्ट्र को विकसित भारत बनाने की यात्रा में भारतीय ज्ञान परम्परा की शक्ति और भावना की आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान परम्परा में अध्ययन और अनुसंधान राष्ट्रीय शिक्षा नीति के केन्द्रित क्षेत्रों में से एक है। भारतीय ज्ञान परम्परा 21 वीं सदी में भविष्य की चुनौतियों का समाधान करते हुए हमारे विकास की जड़ों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। विद्यार्थी वर्ग ने किया व्यापक स्वागत मुख्यमंत्री डॉ. यादव का मानना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 द्वारा ऐसे नागरिकों का निर्माण करना है जो विचार, बौद्धिकता व कार्य व्यवहार से भारतीय बनकर विश्व कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हों। विश्व में भारतीय संस्कृति और परंपरा की अपनी एक विशिष्ट पहचान है। राष्ट्र की संस्कृति और परंपरा केवल एक संकल्पना नहीं होती, बल्कि यह अभिमान और गर्व का विषय है। भारत वर्ष शोध एवं अनुभव से संचित ज्ञान कोष से विश्व का मार्गदर्शन करता रहा हे। भारत पुन: गौरव को प्राप्त करे, इस दिशा में भारतीय ज्ञान परंपरा को दृष्टिगत रखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व और मार्गदर्शन में प्रदेश में प्रेरक वातावरण का निर्माण किया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के पाठ्यक्रमों में भारतीय ज्ञान परंपरा को समाहित करने के उद्देश्य से मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा भारतीय ज्ञान परम्परा पुस्तक प्रकाशित की गई है। इसके माध्यम से सम्पूर्ण प्रदेश में शिक्षा को नया आयाम दिया गया है। इस नवाचार की सम्पूर्ण राष्ट्र में गूंज है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विद्यार्थी वर्ग ने भी इस नवाचार को न सिर्फ सराहा है बल्कि शिक्षा में जुड़े इस अनोखे आयाम का व्यापक स्वागत किया है। उज्जैन भी शामिल है प्राचीन शिक्षा केंद्रों में मुख्यमंत्री डॉ. यादव का मनना है कि शिक्षा एक अविराम प्रक्रिया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विद्यार्थियों में शैक्षणिक गुणवत्ता वृद्धि और तार्किकता के साथ संवेदनशीलता, चरित्रनिर्माण और नैतिकता के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसके साथ ही राष्ट्रीय नीति में शिक्षा के सभी स्तरों पर भारतीय ज्ञान परम्परा के समावेश की अनुशंसा भी की गई है। देश की बड़ी आबादी शिक्षा से संबंध रखती है, इसलिये शिक्षा व्यवस्था को भारतीय ज्ञान परम्परा को जोड़ने से इस ज्ञान के समाज के सभी वर्गों में प्रसार में मदद मिलेगी। भारत में हजारों से वर्षों से अर्जित ज्ञान का खजाना है, जो कला, साहित्य परम्पराओं, रीति रिवाजों, भाषाओं, वास्तुकला आदि के रूप में प्रकट होता है। भारतीय ज्ञान परम्परा हमारी संस्कृति सनातन है। प्राचीन के साथ आधुनिकता का समन्वय हमारी शिक्षा व्यवस्था का अंग रहा है। भारत में कई देशों के विद्यार्थी उज्जैन सहित तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, काशी और अन्य विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थाओं में अध्ययन के लिए आते थे। भारतीय ज्ञान प्रणाली में दूरदर्शिता और मानव कल्याण का भाव सर्वोपरि रहा है। भारतीय जड़ों और गौरव से जुड़े रहना और जहां प्रासंगिक लगे वहां भारत की समृद्ध और विविध प्राचीन व आधुनिक संस्कृति तथा ज्ञान प्रणालियों और परम्पराओं को वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शामिल कर उससे प्ररेणा लेना वर्तमान युग में आवश्यक हो गया है। हिन्दी ग्रंथ अकादमी की पहल की हुई प्रशंसा मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने नेतृत्व में इसी उद्देश्य से महाविद्यालयीन स्तर पर विभिन्न विषयों में भारतीय ज्ञान परम्परा के योगदान को सम्मिलित किया गया है। इस क्रम में विज्ञान और प्रौद्योगिकी, चरित्रनिर्माण और व्यक्तित्व के समग्र विकास, गणित, सामाजिक व्यवस्था, संगीत, कला, प्रबंधन, राजनैतिक विचार, भूगौल, मनोविज्ञान, पर्यावरण, दर्शन, खगौल शास्त्र, आदि विषयों में सदियों से भारतीयों द्वारा विकसित ज्ञानमयी प्राचीन प्रक्रियाओं को सम्मिलित किया गया है। पुस्तक की हो रही व्यापक सराहना भारतीय ज्ञान परम्परा पर केंद्रित प्रकाशन विद्यार्थियों और शिक्षकों ने सराहा है। इस दिशा में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी ने विशेष पहल करते हुए पुस्तक भारतीय ज्ञान परम्परा का प्रकाशन किया। यह पुस्तक शिक्षकों, विद्यार्थियों और जिज्ञासु वर्ग को भारतीय अवधारणाओं को समझने और आत्मसात करने में सहायक सिद्ध हो रही है। अकादमी की पहल की चारों ओर प्रशंसा भी हुई है। अन्य प्रांतों के शिक्षाविद इस पुस्तक को सम्मानपूर्वक अध्ययन कर अपने राज्यों में इस तरह के नवाचार के लिए प्रेरित हुए हैं। हरि प्रसाद पाल / 29 नवम्बर, 2025