राज्य
29-Nov-2025
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:: जीवन प्रबंधन गुरु ने श्रद्धा को जीवन के चारों चरणों में सहेजने की आवश्यकता बताई; कल गीता जयंती पर सामूहिक पाठ आयोजित होगा :: इंदौर (ईएमएस)। जीवन प्रबंधन गुरु पं. विजय शंकर मेहता ने गीता जयंती महोत्सव में उपस्थित श्रद्धालुओं को गंभीर चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि समय रहते हमने अपने घर-परिवार को श्रद्धा से नहीं जोड़ा, तो इसके भयावह परिणाम देखने को मिल सकते हैं। उन्होंने वर्तमान युग की महती आवश्यकता बताते हुए कहा कि हमें बच्चों में योजनाबद्ध ढंग से श्रद्धा को रोपित करने, युवाओं में श्रद्धा को आत्मसात करने, प्रौढ़ अवस्था में श्रद्धा को स्थापित करने और वृद्धावस्था में श्रद्धा को संरक्षित करने की आवश्यकता है। पं. विजय शंकर मेहता शनिवार को गीता भवन में चल रहे 68वें अ.भा. गीता जयंती महोत्सव की धर्म सभा को सम्बोध‍ित कर रहे थे। पं. मेहता ने बल दिया कि हमारी श्रद्धा सात्त्विक होनी चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से बाल्य और वृद्धावस्था पर ध्यान देने की बात कही। उन्होंने पीढ़ियों के बढ़ते अंतर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज वृद्ध शिकायत करते हैं कि बच्चे सुनते नहीं, और बच्चे कहते हैं कि बुजुर्गों को सुनाई नहीं देता। इस अंतर के कारण अधिकांश प्रौढ़ चिड़चिड़े हो गए हैं। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा, यदि हमारे वृद्ध भीष्म पितामह की तरह द्रौपदी के चीरहरण जैसे पाप कर्म को गर्दन नीची कर मूकदर्शक बने रहेंगे, तो भगवान की नजरों में यह भी पाप कर्म ही होगा। लेकिन यदि हमने अपने बच्चों और युवाओं को श्रद्धा से जोड़े रखा, तो हमारे बच्चे दुर्योधन नहीं, अर्जुन ही बनेंगे। पं. मेहता ने स्पष्ट किया कि श्रद्धा आज की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने यह भी चेताया कि कुछ ताकतें ऐसी भी सक्रिय हैं, जो हमारे भारतीय परिवारों पर सांस्कृतिक हमला करने के मनसूबे बना रही हैं। इनसे बचने के लिए हमें सतर्क रहना होगा। अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के आचार्य, जगदगुरू स्वामी रामदयाल महाराज की अध्यक्षता में आयोजित इस महोत्सव में शनिवार को गोंडा (उ.प्र.) से आए पं. प्रह्लाद मिश्र रामायणी, उज्जैन के महामंडलेश्वर स्वामी परमानन्द, काशी के मानस मर्मज्ञ पं. रामेश्वर त्रिपाठी, वृंदावन से आए स्वामी वृंदावन दास, साध्वी आदित्य चेतना गिरि, उज्जैन के स्वामी असंगानंद तथा आर्ष विद्या प्रतिष्ठा के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती ने भी विभिन्न सामूहिक विषयों पर अपने प्रेरक एवं ओजस्वी विचार व्यक्त किए। प्रारंभ में गीता भवन ट्रस्ट मंडल की ओर से अध्यक्ष राम ऐरन, मंत्री रामविलास राठी, कोषाध्यक्ष मनोहर बाहेती, टीकमचंद गर्ग, दिनेश मित्तल, हरीश माहेश्वरी, महेशचंद्र शास्त्री, संजीव कोहली एवं सत्संग समिति के श्याम मोमबत्ती, रामकिशोर राठी, प्रदीप अग्रवाल, अरविन्द नागपाल, त्रिलोकीनाथ कपूर, सुभाष झंवर एवं चंद्रप्रकाश गुप्ता ने सभी संतों एवं विद्वानों का स्वागत किया। इस अवसर पर समाजसेवी सुरेश शाहरा, दिलीप देव सहित अनेक धार्मिक-सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी संतों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन पं. प्रह्लाद मिश्र एवं डाकोर के वेदान्ताचार्य देवकीनंदन दास महाराज ने किया। आचार्य पं. कल्याण दत्त शास्त्री के निर्देशन में आज भी विष्णु महायज्ञ में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने परिवार, समाज एवं राष्ट्र में सुख, शांति एवं सद्भाव की कामना से आहुतियाँ समर्पित कीं। :: संतों के प्रवचन :: पं. विजय शंकर मेहता (जीवन प्रबंधन गुरु) : पं. मेहता ने कहा कि आजकल कथा पंडालों में अधिकतर वृद्ध लोग, दादा-दादी और नाना-नानी ही नज़र आते हैं। वृद्धावस्था में श्रद्धा फिसलती जा रही है। बुढ़ापे में मोह को छोड़ना आवश्यक है। बहुत कम लोग हैं जो अपनी वृद्धावस्था से संतुष्ट हैं। उन्होंने कहा कि बूढ़े लोग क्रोध नहीं कर सकते, इसलिए उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है; हर पाँचवाँ वृद्ध चिड़चिड़ा हो गया है। उन्होंने कहा, उम्र के बाल्यकाल, युवावस्था, प्रौढ़ अवस्था और वृद्धावस्था, इन चारों सोपानों पर हमें श्रद्धा को सँभालकर रखना होगा। सबसे बुरी स्थिति प्रौढ़ अवस्था की है, जो सैंडविच बन गए हैं - उनके बच्चे भी नाराज़ हैं और माता-पिता भी संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस पीढ़ी को श्रद्धा से नहीं जोड़ा गया, तो कृत्रिम बौद्धिकता के इस दौर में बच्चे परिवार और समाज की डिजाइन ही बदल डालेंगे। उन्होंने कहा कि श्रद्धा रहेगी, तो वृद्धावस्था भी संतुष्टि और प्रशंसा के साथ व्यतीत हो जाएगी। वैष्णव वृद्ध को तो अंतिम साँस तक परमात्मा के प्रति अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए। महामंडलेश्वर स्वामी परमानन्द (उज्जैन) : स्वामी परमानन्द ने गीता को असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और जन्म-मृत्यु से अमृत्व की ओर ले जाने वाला ग्रंथ बताया। उन्होंने कहा कि केवल सात दिन महोत्सव सुन लेने से श्रेष्ठ कर्मफल नहीं मिलेगा। गीता का शुभारंभ विषाद से होता है। उन्होंने गीता के संदेशों को आत्मसाध करने पर बल दिया। पं. रामेश्वर त्रिपाठी (काशी के मानस मर्मज्ञ ): उन्होंने कहा कि जन्म-जन्मांतर के पुण्योदय से ही सत्संग श्रवण का अवसर मिलता है। हमारी श्रद्धा मन, वचन और कर्म के प्रति होनी चाहिए। मस्तिष्क में बौद्धिकता, हृदय में हार्दिकता और चरणों में धार्मिकता होगी, तभी सत्संग का पुण्य लाभ मिलेगा। स्वामी वृंदावनदास महाराज (वृंदावन ): स्वामी वृंदावनदास ने सनातन धर्म के तीन प्रमुख ग्रंथों - गीता, रामायण एवं श्रीमद्भागवत को श्रवण करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि भक्ति से जुड़ने पर स्वयं भगवान भी नाचने लगते हैं; मीरा, कबीर, सूरदास और तुलसी ने भक्ति से ही भगवान को रिझाया। साध्वी आदित्य चेतना गिरि : साध्वीजी ने जीवन की मंजिल पाने के लिए पद्धति, पगडंडी और राजमार्ग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिन्हें लगता है कि स्त्री को वेद पाठ करने का अधिकार नहीं है, उन्हें गीता के दसवें अध्याय के चौदहवें श्लोक का अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने मातृशक्ति को पूरा सम्मान देने की बात कही। उज्जैन के स्वामी असंगानंद और महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती के प्रवचनों के उपरांत, अध्यक्षीय आशीर्वचन में जगद्गुरु स्वामी रामदयाल महाराज ने गीता के संदेशों की प्रासंगिकता बताते हुए सबके मंगल की कामना की। :: आज के कार्यक्रम (30 नवंबर) :: अ.भा. गीता जयंती महोत्सव के तृतीय सौपान पर 30 नवंबर रविवार को सुबह 9 से 10 बजे तक दैनिक प्रवचन श्रृंखला में महामंडलेश्वर स्वामी रामकृष्णानंद गिरि के प्रवचन होंगे। दोपहर में महोत्सव के अंतर्गत 1 बजे से स्वामी देवकीनंदन दास डाकोर, 1.30 से वृंदावन के स्वामी केशवाचार्य, 2 बजे से नेमिषारण्य से आए स्वामी पुरुषोत्तमानंद सरस्वती. 2.30 बजे से उज्जैन के स्वामी असंगानंद महाराज, 3 बजे से वृंदावन के बालशुक पं. पुंडरिक कृष्ण, 3.45 बजे से वाराणसी से आए स्वामी कृष्णानंद, 4.30 बजे से गोधरा से आई साध्वी परमानंदा सरस्वती एवं 5.15 बजे से जगद्गुरु स्वामी रामदयाल महाराज के अध्यक्षीय आशीर्वचन होंगे। सोमवार 1 दिसम्बर को गीता जयंती का मुख्य महोत्सव सुबह 8 बजे से मनाया जाएगा जिसमें सभी संत विद्वान एवं श्रद्धालु एकसाथ बैठकर गीता के 18 अध्यायों का सामूहिक पाठ करेंगे। प्रकाश/29 नवम्बर 2025