लेख
24-May-2026
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भारत में बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में पिछले कुछ वर्षों में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। कुपोषण कम करने स्वस्थ गर्भावस्था सुनिश्चित करने और नवजात बच्चों को गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। हाल ही में सामने आई रिपोर्टों ने यह साबित किया है कि सही नीति मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और जागरूकता के जरिए बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाया जा सकता है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और खसरा रुबेला टीकाकरण अभियान इसी बदलाव के सबसे बड़े उदाहरण बनकर उभरे हैं। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता देकर उन्हें बेहतर पोषण और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना था। वर्ष 2010 में शुरू हुई इस योजना ने धीरे धीरे देश की लाखों महिलाओं और बच्चों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया। रिपोर्ट के अनुसार इस योजना के कारण बच्चों के औसत वजन में 130 से 165 ग्राम तक वृद्धि दर्ज की गई है जबकि उनकी लंबाई में भी 0.22 से 0.46 सेंटीमीटर तक सुधार हुआ है। पहली नजर में यह आंकड़े छोटे लग सकते हैं लेकिन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार नवजात बच्चों के लिए यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जन्म के समय वजन और लंबाई में सुधार भविष्य में बच्चों की शारीरिक और मानसिक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करता है। आसियटन के इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा तैयार रिपोर्ट में बताया गया है कि इस योजना ने महिलाओं के खानपान और स्वास्थ्य व्यवहार में बड़ा परिवर्तन किया। गर्भवती महिलाओं को मिलने वाली आर्थिक सहायता ने उन्हें पौष्टिक भोजन लेने में मदद की। इससे महिलाओं की कमजोरी कम हुई और बच्चों को जन्म से पहले ही बेहतर पोषण मिल सका। यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी कैश ट्रांसफर योजनाओं में शामिल है जो सीधे गर्भवती महिलाओं को लाभ पहुंचाती है। रिपोर्ट में वर्ष 2005 से 2021 तक के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों और 96 हजार से अधिक बच्चों के जन्म से जुड़े डाटा का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि योजना के कारण गरीब परिवारों की महिलाओं की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हुआ। पहले जहां 1400 रुपए से कम सहायता पाने वाली महिलाओं की संख्या बहुत अधिक थी वहीं अब बड़ी संख्या में महिलाएं अधिक सहायता प्राप्त कर रही हैं। इससे उनके भोजन और देखभाल की स्थिति बेहतर हुई। गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार का सीधा असर बच्चों पर दिखाई दिया। छह से तेईस माह तक के बच्चों में दूध दही अंडे मांस मछली और फल सब्जियों के सेवन का प्रतिशत बढ़ा है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि परिवारों में पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ी है। बच्चों के शरीर और मस्तिष्क के विकास के लिए संतुलित भोजन बेहद जरूरी होता है और यही कारण है कि अब बच्चों की वृद्धि में सुधार देखने को मिल रहा है। योजना का एक बड़ा प्रभाव गर्भावस्था की देखभाल में भी दिखाई दिया। पहले कई महिलाएं समय पर पंजीकरण नहीं करवाती थीं और अस्पतालों में नियमित जांच से दूर रहती थीं। अब गर्भ पंजीकरण का प्रतिशत 93 से बढ़कर 97 तक पहुंच गया है। इससे डॉक्टरों को समय रहते गर्भवती महिलाओं की स्थिति पर नजर रखने का मौका मिला। कई जटिलताओं का इलाज समय पर संभव हुआ और मातृ मृत्यु दर में कमी लाने में मदद मिली। बच्चों के टीकाकरण में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। पूर्ण टीकाकरण का प्रतिशत 70 से बढ़कर 82 तक पहुंच गया। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं अब गांव और दूरदराज क्षेत्रों तक पहुंच रही हैं। टीकाकरण केवल एक इंजेक्शन नहीं बल्कि बच्चे को भविष्य की गंभीर बीमारियों से बचाने का सुरक्षा कवच है। इसी कड़ी में खसरा रुबेला टीकाकरण अभियान ने भी बड़ी सफलता हासिल की है। रुबेला एक ऐसी बीमारी है जो गर्भवती महिलाओं को संक्रमित करने पर नवजात बच्चों में गंभीर जन्मजात विकृतियां पैदा कर सकती है। इससे बच्चों में हृदय रोग आंखों की कमजोरी सुनने की समस्या और मानसिक विकास में बाधा जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। कई मामलों में बच्चों की मौत भी हो जाती है। वर्ष 2017 में देश में हर दस हजार बच्चों में औसतन 5.2 बच्चे जन्मजात रुबेला सिंड्रोम से प्रभावित पाए जाते थे। लेकिन वर्ष 2025 तक यह आंकड़ा घटकर केवल 0.78 प्रति दस हजार रह गया है। यह उपलब्धि भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान सहित देश के कई बड़े चिकित्सा संस्थानों ने इसका श्रेय खसरा रुबेला टीकाकरण अभियान को दिया है। भारत में एक समय ऐसा था जब दुनिया के कुल जन्मजात रुबेला सिंड्रोम मामलों में 38 प्रतिशत मामले अकेले भारत में पाए जाते थे। हर वर्ष लगभग 40 हजार बच्चे इस बीमारी के कारण विकृति या मौत का शिकार हो रहे थे। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सरकार ने वर्ष 2026 तक इस बीमारी के उन्मूलन का लक्ष्य तय किया। इसके लिए वर्ष 2016 से देशभर में निगरानी और टीकाकरण अभियान शुरू किया गया। नौ माह से चौदह वर्ष तक के बच्चों को इस अभियान में शामिल किया गया। वर्ष 2017 से 2025 के बीच टीकाकरण का प्रतिशत केवल छह प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह बदलाव भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था और जनजागरूकता दोनों की सफलता को दर्शाता है। गांव गांव में स्वास्थ्यकर्मियों ने जाकर बच्चों को टीके लगाए और अभिभावकों को इसके महत्व के बारे में समझाया। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में वर्ष 2016 से 2025 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें 895 मामलों की जांच की गई जिनमें 58 प्रतिशत बच्चों में जन्मजात रुबेला सिंड्रोम की पुष्टि हुई। इनमें से 32 प्रतिशत बच्चों की एक वर्ष के भीतर मृत्यु हो गई। अधिकांश बच्चों में हृदय संबंधी रोग पाए गए जबकि कई बच्चों में सुनने और देखने की क्षमता प्रभावित हुई। इन आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया कि रुबेला जैसी बीमारी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि टीकाकरण के साथ साथ निगरानी भी बेहद जरूरी है। कई बार शुरुआती लक्षण सामान्य दिखाई देते हैं लेकिन समय रहते पहचान होने पर बच्चों का इलाज संभव हो जाता है। यही कारण है कि सरकार अब संदिग्ध मामलों पर लगातार नजर बनाए रखने पर जोर दे रही है। भारत की इन उपलब्धियों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब देश केवल बीमारी का इलाज करने पर नहीं बल्कि बीमारी को रोकने पर भी ध्यान दे रहा है। मातृ वंदना योजना ने जहां गर्भवती महिलाओं को आर्थिक और पोषण सहायता देकर स्वस्थ पीढ़ी की नींव मजबूत की वहीं रुबेला टीकाकरण अभियान ने बच्चों को गंभीर जन्मजात बीमारियों से बचाने का रास्ता तैयार किया। आज भारत दुनिया के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है कि मजबूत इच्छाशक्ति सही योजना और जनभागीदारी के जरिए बड़े स्वास्थ्य संकटों पर विजय पाई जा सकती है। यदि इसी तरह स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होता रहा और लोगों में जागरूकता बढ़ती रही तो आने वाले वर्षों में भारत कुपोषण और जन्मजात बीमारियों के खिलाफ निर्णायक जीत हासिल कर सकता है। स्वस्थ मां और स्वस्थ बच्चा ही किसी भी राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत आधारशिला होते हैं। ईएमएस/24/05/2026