लेख
24-May-2026
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विदेश नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता’’। भारतीय संस्कृति में ‘‘सात फेरे’’ केवल रस्म नहीं, बल्कि स्थायी संबंधों की प्रतिज्ञा माने जाते हैं। यही प्रश्न आज प्रधानमंत्री मोदी की ऊर्जा संकट को लेकर देशवासियों से की गई ‘‘एक वर्ष की अपील’’ पर भी खड़ा होता है। क्या संयम की अपील के संदेशों से यह संकट स्थायी रूप से समाप्त हो जाएगा? स्पष्ट है कि वर्तमान संकट केवल ‘‘तेल बचाने’’ का नहीं, बल्कि ‘‘नीति, प्राथमिकताओं और विदेश नीति’’ की दिशा तय करने का संकट है। ‘‘आग लगने पर कुआँ खोदने’’ की प्रवृत्ति से राष्ट्र लंबे समय तक नहीं चल सकते। संकट का सामना दूरदृष्टि, स्पष्ट रणनीति और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से होता है। संकट आया कब? सरकार जागी कब? कोरोना महामारी के बाद यह दूसरा अवसर है, जब मार्च 2026 में ईरान-अमेरिका संघर्ष ने विश्व को गंभीर ऊर्जा संकट में धकेल दिया। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, समुद्री मार्गों में अवरोध और लॉजिस्टिक लागत बढ़ने से विश्व अर्थव्यवस्था दबाव में आ गई। भारत इस संकट का कारण नहीं था, किंतु उससे अछूता भी नहीं रह सका। विपक्ष का प्रश्न है कि लगभग 70 दिनों से गहराते संकट को जनता के सामने पांच राज्यों के चुनाव समाप्त होने के बाद ही क्यों रखा गया? यदि स्थिति गंभीर थी तो, पूर्व तैयारी और स्पष्ट संवाद पहले क्यों नहीं हुआ? निश्चित रूप से राजनीति में समय और रणनीति का महत्व होता है। प्रधानमंत्री को यह अधिकार है कि वे किसी संकट की जानकारी कब और किस रूप में देश के सामने रखें। किंतु ‘‘देर आयद, दुरुस्त आयद’’ तभी माना जाता है जब साथ में ठोस कार्ययोजना भी हो। विश्व ने तत्परता दिखाई, भारत ने प्रतीक्षा? अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (प्म्।) ने 20 मार्च 2026 को ऊर्जा बचत हेतु 10 सूत्रीय योजना जारी कर दी थी। विश्व के 40 से अधिक देशों ने मार्च-अप्रैल में ही ईंधन बचत, वैकल्पिक ऊर्जा और रणनीतिक भंडारण बढ़ाने के कदम उठा दिए। भारत में चुनावी माहौल के दौरान लगातार यह संदेश दिया गया कि ‘‘सब कुछ नियंत्रण में है’’। यदि उस समय वास्तविक स्थिति से जनता को अवगत कराया जाता तो आज भय और असमंजस की स्थिति कम होती। एक कहावत हैकृ‘‘बीमारी छुपाने से इलाज नहीं होता’’। लोकतंत्र में जनता को विश्वास में लेना आवश्यक है, न कि केवल संकट गहरा जाने के बाद त्याग का आह्वान करना। ‘‘तेल कंपनियों का लाभ और जनता पर भार’’। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने तेल कंपनियों को प्रतिदिन हजारों करोड़ के नुकसान का हवाला दिया। किंतु यह प्रश्न भी स्वाभाविक है कि जब 2015 में कच्चे तेल की कीमत 40 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गई थी और पिछले दशक में औसत कीमत अपेक्षाकृत कम (60-70 डाॅलर प्रति बैरल) रही, तब तेल कंपनियों द्वारा अर्जित भारी लाभ (एक अनुमान के अनुसार 15 से 40 लाख करोड़ रू.) का कितना हिस्सा जनता को राहत देने में उपयोग हुआ? यूपीए सरकार के समय 130 डॉलर प्रति बैरल तेल होने की चर्चा बार-बार की जाती है, किंतु बाद में वर्षों तक सस्ते तेल से हुए लाभ का पूरा हिसाब जनता के सामने कभी नहीं रखा गया। ‘‘मुश्किल में जनता याद आती है, लाभ में जनता भूल जाती है’’कृयह धारणा लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं। ‘‘दोषारोपण नहीं, राष्ट्रीय सहमति आवश्यक’’। ऊर्जा संकट केवल सरकार या विपक्ष का विषय नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की चुनौती है। उत्पादन और मांग के बीच भारी अंतर है। ऐसे में समाधान केवल दो हैं खपत और अपव्यय पर नियंत्रण। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का तीव्र विकास। राजनीतिक दल यदि इस मुद्दे पर ‘‘एक-दूसरे की टांग खींचने’’ में लगे रहे, तो स्थिति और जटिल होगी। राष्ट्रीय संकट में ‘‘रस्साकशी’’ नहीं, ‘‘राष्ट्रनीति’’ आवश्यक होती है। ‘‘सोने के आयात पर कठोर नीति क्यों नहीं?’’ सरकार ने सोने की खरीद कम करने की सलाह दी है, किंतु केवल अपील पर्याप्त नहीं। यदि विदेशी मुद्रा बचाना ही लक्ष्य है तो सीमित अवधि के लिए सोने के आयात पर प्रभावी नियंत्रण पर विचार होना चाहिए। देश में पहले से इतना सोना उपलब्ध है कि सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है। निवेशकों को भी सुरक्षित और आकर्षक वैकल्पिक निवेश विकल्प उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। अन्यथा ‘‘जहाँ भरोसा डगमगाता है, वहाँ सोना चमकने लगता है’’। ‘‘विदेश नीतिः क्या भारत दबाव में है?’’ वर्तमान आर्थिक संकट की जड़ केवल तेल नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा पर बढ़ता दबाव है। इसके तीन प्रमुख कारण हैंः- ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता। सोने का भारी आयात। आयात-निर्यात असंतुलन। इन सबके बीच सबसे बड़ा प्रश्न भारत की विदेश नीति को लेकर उठ रहा है। ‘‘माई फ्रेंड ट्रंप’’ और भारत की स्वतंत्र नीति’’। डोनाल्ड ट्रंप के पुनः राष्ट्रपति बनने के बाद भारत-अमेरिका संबंध व्यक्तिगत मित्रता की भाषा में तो मजबूत दिखाई देते हैं, किंतु व्यवहारिक स्तर पर भारत कई मामलों में दबाव में नजर आता है। विशेषकर तेल नीति को लेकर भारत स्वतंत्र निर्णय लेने में हिचकता दिखाई देता है। ट्रंप द्वारा कई मौकों पर भारत के प्रति कठोर और अपमानजनक टिप्पणियाँ किए जाने के बावजूद भारत की खासकर मोदी की जवाबी प्रतिक्रिया नहीं रही। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का कथन ‘‘सहयोगी होने का अर्थ गुलाम होना नहीं’’कृआज विश्व राजनीति में आत्मसम्मान आधारित कूटनीति का उदाहरण बन गया है। मोदी सीख ले सकते है। ऐसे विश्व में राष्ट्र प्रमुखों के ऐसे कई उदाहरण मौजूद है। ‘‘भारत-ईरान संबंध टूटी कड़ी किसने तोड़ी?’’ 2019 तक भारत ईरान से रियायती दरों पर रुपये में तेल खरीद रहा था। मुफ्त बीमा, मुफ्त परिवहन और क्रेडिट सुविधा के कारण भारत को अरबों डॉलर की बचत हुई। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने तेल खरीदना लगभग बंद कर दिया। परिणामस्वरूप व्यापार संतुलन बिगड़ा और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ा। अब जबकि ईरान खुले तौर पर भारत को पुनः तेल बेचने की इच्छा जता रहा है, तब भारत इस अवसर का लाभ उठाने में संकोच क्यों कर रहा है? यही वह प्रश्न है जो विदेश नीति की स्वतंत्रता पर बहस खड़ी करता है। ‘‘रूस नीति में भी बदलाव क्यों?’’ रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने प्रारंभ में रियायती तेल खरीदी जारी रखी, किंतु धीरे-धीरे उसमें कमी दिखाई देने लगी। जबकि चीन अमेरिकी दबावों की परवाह किए बिना ईरान और रूस दोनों से तेल खरीदता रहा। भारत की विदेश नीति का ऐतिहासिक आधार ‘‘रणनीतिक स्वायत्तता’’ रहा है। 1971 में अमेरिका के सातवें बेड़े की धमकी के बावजूद भारत झुका नहीं था। आज यदि तेल खरीदने के लिए भी अप्रत्यक्ष स्वीकृति की आवश्यकता महसूस हो रही है, तो यह चिंता का विषय अवश्य है। ‘‘डॉलर बचाने की बात और डॉलर में खरीदी?’’ प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा बचाने का आह्वान किया है। किंतु प्रश्न यह है कि यदि ईरान और रूस से रुपये में तेल खरीदा जा सकता है, तो महंगे दाम पर डॉलर में तेल खरीदने की विवशता क्यों? ‘‘एक हाथ से बचत का संदेश और दूसरे हाथ से महंगी खरीदी’’ यह विरोधाभास जनता को समझ नहीं आता। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास हैं) ईएमएस/24/05/2026