लेख
24-May-2026
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देवभूमि उत्तराखंड में तीर्थनगरी जनपद हरिद्वार के जाने-माने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू आसाराम सैनी का आजादी के आंदोलन में सक्रिय योगदान रहा है।वे तिरंगे के लिए जेल भी गए और अंग्रेजों से जमकर लोहा भी लिया।उनका जन्म 7 जुलाई सन् 1921 को ग्राम जलालपुर डाडा तहसील भगवानपुर में हुआ था। उनका बचपन बहुत ही संघर्षों में व्यतीत हुआ। गाॅंव के आसपास पढ़ाई का कोई साधन न होने के कारण उन्हें अपने गाॅंव से 25 किलोमीटर दूर स्थित कैलाशपुर जनपद सहारनपुर के मिडिल स्कूल में दाखिला लेना पड़ा, जहाॅं से उन्होंने सन् 1935 में उर्दू में मिडिल की तथा सन 1936 में हिंदी मिडिल द्वितीय श्रेणी में पास की। मिडिल पास करने के बाद उनकी अध्यापक के रूप में प्रथम नौकरी लक्सर के पास ग्राम सीधडू में अध्यापक के रूप में लग गई ।उन्होंने कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया और उसके बाद सन् 1938 में उनकी नौकरी गन्ना सोसायटी शुगर मिल लक्सर में सुपरवाइजर के पद पर लग गई। स्वतंत्रता संघर्ष में कूदते समय तक वह इसी पद पर कार्यरत रहे। वह सन् 1938 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए थे तथा संगठन के विभिन्न पदों पर दायित्व निभाते रहे। उन्होंने उस जमाने के प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित ताराचंद वत्स, ठाकुर फूल सिंह,अजीत प्रसाद जैन, डॉ जय गोपाल गुप्ता एवं बाबू तेलूराम सैनी के साथ मिलकर तथा उनके मार्गदर्शन में न केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कार्य किया बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष में प्रथम बार उन्होंने भगवानपुर में दिनांक 5 अप्रैल सन 1941 को व्यक्तिगत सत्याग्रह किया ,जिस कारण उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और उनकी गन्ना समिति में सुपरवाइजर की नौकरी भी हाथ से जाती रही। उन्हें धारा 38 डी आई आर के अंतर्गत एक वर्ष के कठोर कारावास व 20 रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई गई ।जुर्माना न देने की स्थिति में एक माह की ओर सजा काटने के आदेश दिए गए थे। स्वतंत्रता आंदोलन में दूसरी बार उन्हें गांधी जी द्वारा 9 अगस्त 1942 को करो या मरो की घोषणा के बाद दिनांक 11 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।इस बार उन्हें धारा 129 डी आई आर में नजर बंद किया गया तथा दिनांक 20 नवंबर 1943 को रिहा किया गया। इस बार की जेल यात्रा उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रही क्योंकि जेल में उनके कान खराब हो गए और उचित चिकित्सा न मिलने के कारण उनके दोनों कानों के पर्दे क्षतिग्रस्त हो गए जो फिर जीवन भर ठीक नहीं हो सके। आजादी मिलने के बाद उन्होंने जमीदारी उन्मूलन के कार्य में अपना विशेष योगदान किया। उन्होंने शिक्षा के प्रचार -प्रसार एवं सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने में आजीवन अपना सक्रिय योगदान किया। वह सन् 1952 में जिला परिषद सहारनपुर के सदस्य निर्वाचित हुए तथा उन्हें जिला परिषद की शिक्षा समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। उन्होंने जनपद सहारनपुर में अनेक विद्यालयों की स्थापना कराई तथा किसानों की सहूलियत के लिए उन्होंने दूर- दराज के ग्रामों में कॉपरेटिव के दफ्तर व गोदाम बनवाये ,जिससे किसानों को ऋण एवं बीज आदि सुगमता पूर्वक मिल सकें। वह अंत समय तक समाज सेवा के विभिन्न कार्यों से जुड़े रहे। उनका देहांत 25 मई सन् 1991 को हुआ था। उनके देहांत के बाद शासन ने उनकी स्मृति में ग्राम जलालपुर डाडा में उनके नाम से बाबू आसाराम राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की स्थापना की है, जिसमें आसपास के क्षेत्र के सैकड़ों जरूरतमंद बच्चे शिक्षा ग्रहण कर अपना भविष्य उज्ज्वल बना रहे हैं।ग्राम जलालपुर डाडा में ही उनकी समाधि बनाई गई है जहाॅं प्रतिवर्ष 25 मई के दिन परिवार व इलाके के लोग मिलकर श्रद्धापूर्वक उनकी पुण्यतिथि मनाते हैं। (लेखक स्वतंत्रता सेनानी परिवार कल्याण महापरिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता है) ईएमएस/24/05/2026