लेख
24-May-2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात,नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली देशों का दौरा किया। इस दौरान नॉर्वे की एक घटना ने एक बार फिर मीडिया उसके कर्तव्य व दायित्व को लेकर बहस छेड़ दी। दरअसल ओस्लो में जब मोदी, नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर के साथ जैसे ही मंच से जाने लगे उसी समय एक युवा महिला पत्रकार हेला लिंग ने मोदी को संबोधित करते हुये कुछ सवाल पूछे। हेला लिंग ने पूछा प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते? मोदी पत्रकार के सवाल का जवाब दिए बिना ही वहां से चले गए। इस घटना के फ़ौरन बाद भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा उसी जगह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई जिसमें पत्रकार हेला लिंग को भी बुलाया गया। वहाँ भी हेला लिंग ने भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर कई तीखे सवाल पूछे, जिस पर भारतीय अधिकारियों ने भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और विकास का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखने का प्रयास किया। 。 परन्तु नॉर्वे की इस घटना पर भारतीय गोदी मीडिया ने युवा साहसी महिला पत्रकार हेला लिंग को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और उन्हें मीडिया के कर्तव्य व दायित्व बोध का पाठ पढ़ने लगा। गोदी मीडिया ने महिला पत्रकार के इस तरीक़े को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की रणनीति क़रार दिया। वहीँ भारत के ही स्वतंत्र, डिजिटल,वैकल्पिक,निष्पक्ष व सोशल मीडिया ने पत्रकार हेला की जमकर तारीफ़ की। इस वर्ग ने हेला लिंग के साहस की सराहना की और इसे सच्ची पत्रकारिता का उदाहरण बताया तथा इस पूरी घटना को वैश्विक स्तर पर प्रेस की आज़ादी और लोकतंत्र में जवाबदेही से जोड़कर देखा। कुछ स्वतंत्र विचारकों और कई सोशल मीडिया पोर्टल्स ने तो इस अवसर का प्रयोग उन गोदी पत्रकारों पर तंज़ कसने के लिए किया जो सत्ता से सवाल पूछने के बजाये सत्ता की ख़ुशामद में लगे रहते हैं। यही वजह है कि जो सवाल भारत के शीर्ष मुख्यधारा के पत्रकारों को पूछने चाहिए थे वही सवाल एक विदेशी पत्रकार को पूछने पड़ रहे हैं। दरअसल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अब तक एक भी नियमित संवाददाता सम्मेलन आयोजित नहीं किया है। अपने एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं बताया था कि वे पुरानी परिपाटी जहाँ नेता मीडिया के माध्यम से अपनी बात प्रसारित करते थे, के बजाय सीधे जनता के बीच जाकर काम करने और नई कार्य संस्कृति स्थापित करने पर विश्वास रखते हैं। मन की बात,सार्वजनिक रैलियां,चुनावी सभाएं, सम्पादकीय पृष्ठ के अपने आलेख,किसी कार्यक्रम स्थल पर आयोजित जन सभा आदि के माध्यम से जनता से इकतरफ़ा संवाद करना प्रधानमंत्री का पसंदीदा तरीक़ा है। जबकि भारत के लगभग सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों की यह नियमित परंपरा रही थी कि वे विदेश दौरों से लौटने,विमान में या देश में समय-समय पर खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित किया करते थे। सच तो यह है कि मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मीडिया से जुड़े उनके कुछ ऐसे कटु अनुभव रहे हैं जिसके चलते वे अब पुनः साहसी पत्रकारों से रूबरू होकर पुनः अपनी वैसी फ़ज़ीहत नहीं कराना चाहते। याद कीजिये अक्टूबर 2007 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे,उस समय वरिष्ठ पत्रकार करण थापर ने सी एन एन-आई बी एन के प्रसिद्ध शो डेविल्स एडवोकेट के लिए अहमदाबाद में मोदी का इंटरव्यू लिया था। करण थापर ने मोदी से अपने पहले सवाल में ही 2002 के गुजरात दंगों को लेकर पूछा कि दंगों के पांच साल बाद भी उनकी छवि एक क्रूर शासक की बनी हुई है, इसे सुधारने के लिए उन्होंने क्या किया? जब मोदी ने कहा कि जनता उन्हें अच्छे से जानती है, तो थापर ने अगला सवाल किया कि आप यह क्यों नहीं कह देते कि आपको दंगों में मारे गए लोगों का दुख या पछतावा है? क्या सरकार को मुसलमानों की सुरक्षा के लिए और क़दम नहीं उठाने चाहिए थे? इस सवाल पर मोदी पूरी तरह असहज हो गए। उन्होंने कहा कि जो मुझे कहना था, मैं उस समय कह चुका हूँ। परन्तु जब थापर ने बार-बार उसी सवाल को दोहराया, तो मोदी ने इंटरव्यू आगे बढ़ाने से मना कर दिया। 3- 4 मिनट के भीतर ही मोदी ने पानी पीने का बहाना कर अपने कुर्ते पर लगा माइक निकाला और उसे टेबल पर रख दिया। फिर उन्होंने बहुत ही शालीनता से थापर से कहा—दोस्ती बनी रहे। आप यहाँ आए, इसके लिए धन्यवाद। इसके बाद वे कैमरे के सामने से उठकर चले गए। ऐसी ही दूसरी घटना वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान की है। उस समय वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी एन डी टी वी के लिए चक्रव्यूह नामक एक शो करते थे। उन्होंने मोदी का इंटरव्यू चुनावी रैली पर जाते समय हेलीकॉप्टर यात्रा के दौरान लिया। त्रिवेदी ने भी मोदी से पूछा कि क्या गुजरात दंगों के लिए भाजपा या उन्हें (मोदी को) माफ़ी मांगनी चाहिए? मोदी ने इस पर कहा कि वे इस विषय पर कई इंटरव्यू में पहले ही बोल चुके हैं। लेकिन जब त्रिवेदी ने लगातार इस सवाल पर दबाव बनाया, तो मोदी का मूड बदल गया। बाद मोदी ने ग़ुस्से में आकर सवालों के जवाब देना पूरी तरह बंद कर दिया और चुप हो गए। मोदी ने अपना ही हाथ आगे बढ़ाकर कैमरे के लेंस को बंद करवा दिया। इसके बाद का पूरा सफ़र दोनों ने बिना एक-दूसरे से बात किए और खिड़की से बाहर देखते हुए बिताया। हेलीकॉप्टर के उतरते ही मोदी ने विजय त्रिवेदी से कहा—विजय भाई, यह हमारी आख़िरी मुलाक़ात है। इसके बाद मोदी अपनी जनसभा को संबोधित करने चले गए। जबकि विजय त्रिवेदी और उनकी टीम को हेलीकॉप्टर से नीचे उतार दिया गया। बाद में त्रिवेदी को संदेश मिला कि मोदी हेलीकॉप्टर लेकर वापस जा चुके हैं। त्रिवेदी और उनकी टीम को वापस लौटने के लिए वहाँ कोई गाड़ी नहीं मिली, जिसके बाद उन्हें एक ट्रैक्टर और फिर लोकल बस के द्वारा क़रीब 8 घंटे की यात्रा कर अपने गंतव्य तक वापस लौटना पड़ा था। यह घटनायें इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये काफ़ी हैं कि मोदी स्वतंत्र व निष्पक्ष मीडिया से संवाद क्यों नहीं करते। वे वास्तविक व निष्पक्ष पत्रकारों के इस सिद्धांत को बख़ूबी जानते हैं कि न स्याही के हैं दुश्मन न सफ़ेदी के हैं दोस्त। हमको आईना दिखाना है दिखा देते हैं। ईएमएस / 24 मई 26