लेख
24-May-2026
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भारत के लोकतंत्र को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक ढांचा माना जाता है। 1950 में लागू हुए संविधान ने देश के नागरिकों को समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार, संस्कृति और शिक्षा संबधी अधिकारी के साथ ही न्याय की गारंटी दी है। संविधान निर्माताओं ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के रूप में ऐसी त्रिस्तरीय व्यवस्था तैयार की, जिसका उद्देश्य शक्ति का संतुलन बनाए रखना और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना था। लेकिन वर्तमान समय में यह प्रश्न गंभीरता से उठने लगा है कि क्या ये संस्थाएं अपने मूल दायित्वों का निर्वाह उसी निष्पक्षता और संवेदनशीलता से कर रही हैं, जिसकी अपेक्षा संविधान निर्माताओं ने की थी। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। जब नागरिक अपने मताधिकार से सरकार चुनते हैं, तो वे केवल सत्ता नहीं सौंपते, बल्कि अपने अधिकारों और भविष्य की रक्षा की जिम्मेदारी भी राज्य को देते हैं। संविधान ने स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित किया कि कोई भी संस्था निरंकुश न हो। विधायिका कानून बनाएगी, कार्यपालिका उन्हें लागू करेगी और न्यायपालिका इस बात की निगरानी करेगी कि संविधान और नागरिक अधिकारों का उल्लंघन न हो। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा मजबूत होती दिखाई दे रही है कि सत्ता और अधिकार का केंद्रीकरण बढ़ रहा है। सरकारें कठोर कानून बना रही हैं, जांच एजेंसियां लंबे समय तक लोगों को जेलों में बंद रख रही हैं और अदालतों में न्याय मिलने में असामान्य देरी हो रही है। इससे नागरिकों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या न्याय केवल कागजों तक सीमित होकर रह गया है। भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है, “जमानत नियम है और जेल अपवाद।” इसके बावजूद आज अनेक मामलों में आरोपी वर्षों तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेलों में बंद रहते हैं। कई बार मुकदमे शुरू तक नहीं हो पाते, जबकि आरोपी अपनी संभावित सजा से अधिक समय जेल में बिता देता है। यह स्थिति केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संकट में धकेल देती है। चिंता की बात यह है कि कठोर कानूनों के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था जरूरी हैं, लेकिन इनके नाम पर मौलिक अधिकारों की अनदेखी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती। जब कानून का प्रयोग समान रूप से न होकर चयनात्मक रूप से होता दिखाई देता है, तब नागरिकों का विश्वास कमजोर होने लगता है। आज समाज में यह धारणा भी गहराती जा रही है कि प्रभावशाली और पूंजी संपन्न वर्ग के लिए नियम अलग हैं, जबकि आम नागरिकों के लिए अलग। न्याय में समानता लोकतंत्र की आत्मा है। यदि अदालतों के फैसलों में विरोधाभास, देरी और पक्षपात का आरोप बढ़ने लगे, तो यह केवल न्यायपालिका ही नहीं, पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर चुनौती बन जाता है। न्यायपालिका लोकतंत्र का अंतिम प्रहरी मानी जाती है। इसलिए उससे सबसे अधिक संवेदनशीलता, संयम और निष्पक्षता की अपेक्षा होती है। अदालतों की टिप्पणियां और फैसले समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं। ऐसे में यदि न्यायालयों से ऐसी टिप्पणियां आती हैं, जो आम नागरिकों की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं, तो असंतोष स्वाभाविक है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति को राष्ट्रविरोध नहीं माना जा सकता। सरकार और नागरिकों के बीच वैचारिक मतभेद लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा हैं। यदि विरोध की हर आवाज को कठोर कानूनों के जरिए दबाने की कोशिश होगी, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों आत्ममंथन करें। अधिकार का अर्थ निरंकुशता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी होता है। संविधान ने किसी भी संस्था को सर्वोच्च नहीं बनाया, बल्कि सभी को जवाबदेह बनाया है। यदि अधिकारों के साथ विनम्रता और संवेदनशीलता समाप्त हो जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल व्यवस्था बनकर रह जाता है, जनविश्वास नहीं। इतिहास गवाह है कि जब जनता का विश्वास टूटता है, तब असंतोष भीड़ में बदल जाता है और भीड़ किसी नियम या व्यवस्था को नहीं मानती। इसलिए समय रहते लोकतांत्रिक संस्थाओं को यह समझना होगा कि संविधान केवल सत्ता चलाने का दस्तावेज नहीं, बल्कि नागरिकों के सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा का संकल्प है। यदि इस संकल्प की अनदेखी हुई, तो उसके दुष्परिणाम पूरे राष्ट्र को भुगतने पड़ सकते हैं। ईएमएस / 24 मई 26