09-Jun-2026
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- परिवार को 22 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के यरवडा मानसिक अस्पताल में एक मरीज की हत्या के मामले में महाराष्ट्र सरकार को बड़ा झटका देते हुए मृतक के परिवार को 22 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि राज्य अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल रहा, जिसके कारण मरीज के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ और उसकी जान चली गई। बताया गया है कि यह मामला वर्ष 2013 का है। 52 वर्षीय एक रियल एस्टेट एजेंट, जो सिजोफ्रेनिया (मानसिक बीमारी) से पीड़ित था, को 19 नवंबर 2013 को पुणे स्थित यरवडा मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। भर्ती होने के मात्र दो दिन बाद, 21 नवंबर 2013 को उसकी पत्नी को अस्पताल से सूचना मिली कि उनके पति और एक अन्य मरीज की अस्पताल के ही एक हिंसक मरीज द्वारा हत्या कर दी गई है। बताया गया कि आरोपी मरीज ने दोनों पर हमला किया था, जिससे उनकी मौत हो गई। - आरटीआई से सामने आई लापरवाही मृतक की पत्नी ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी प्राप्त की, जिसमें पता चला कि घटना के समय अस्पताल में पर्याप्त स्टाफ मौजूद नहीं था। इसके बाद परिवार ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया और इस घटना को कस्टोडियल डेथ (सरकारी संरक्षण में हुई मौत) बताते हुए 29 लाख रुपये मुआवजे की मांग की। - हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी न्यायमूर्ति मनीष पितले और श्रीराम शिरसाट की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से स्पष्ट है कि राज्य सरकार मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रही। अदालत ने कहा कि मृतक अस्पताल की देखरेख और संरक्षण में था, इसलिए उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी थी। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि राज्य अपने सार्वजनिक दायित्व और देखभाल की जिम्मेदारी निभाने में असफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप मृतक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि राज्य मानसिक स्वास्थ्य नियमों के अनुसार प्रत्येक पांच मरीजों पर एक परिचारक (अटेंडेंट) होना चाहिए। लेकिन घटना वाली रात अस्पताल के ऑब्जर्वेशन वार्ड में 72 मरीजों के लिए केवल तीन अटेंडेंट ड्यूटी पर मौजूद थे। राज्य सरकार ने भी अपने जवाब में इस तथ्य को स्वीकार किया। अदालत ने यह भी पाया कि अस्पताल प्रशासन ने हिंसक प्रवृत्ति वाले मरीजों को अन्य मरीजों से अलग रखने की आवश्यक व्यवस्था नहीं की थी। इसी लापरवाही के कारण यह गंभीर घटना हुई। - पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक की मौत सिर पर गंभीर चोट और गला दबाने (थ्रॉटलिंग) के कारण हुई थी। अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से अस्पताल प्रशासन की घोर लापरवाही स्पष्ट रूप से साबित होती है और इसके लिए किसी अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है। - बेटे की विशेष स्थिति को देखते हुए बढ़ाया मुआवजा मृतक के परिवार की ओर से अधिवक्ता वृशाली माइंदाद ने अदालत को बताया कि मृतक का बेटा 90 प्रतिशत मानसिक दिव्यांगता से ग्रस्त है और स्वयं कमाने में सक्षम नहीं है। अदालत ने अमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) अधिवक्ता मयूर खांडेपारकर की इस दलील से सहमति जताई कि मुआवजे की गणना मोटर दुर्घटना दावों के सिद्धांतों के आधार पर की जा सकती है। पहले अदालत ने 17 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था, लेकिन बेटे की विशेष जरूरतों और उसकी आजीवन देखभाल को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त 5 लाख रुपये जोड़ दिए। इस प्रकार कुल मुआवजा 22 लाख रुपये तय किया गया। हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि मृतक की पत्नी और दोनों बच्चों को 22 लाख रुपये का मुआवजा आठ सप्ताह के भीतर दिया जाए। यदि निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं किया गया तो इस राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। - ०९ जून/२०२६/ईएमएस