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19-Nov-2023
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अनुमान के अनुसार 2200 करोड़ से अधिक पार्टियों और नेताओं फूंका चुनावी रण में भाजपा और कांग्रेस के नेता कर रहे अपनी-अपनी जीत के दावे... कर्ज पर चलेगा मप्र का शासन! -सवा 4 लाख करोड़ से अधिक का कर्ज और 50 हजार करोड़ से अधिक की घोषणाएं बनेंगी नई सरकार के लिए परेशानी का सबब भोपाल (ईएमएस)। मप्र में इस बार रिकार्ड 77.15 प्रतिशत मतदान हुआ है। मतदान के बाद भाजपा और कांग्रेस ने आंकड़ों का आकलन करना शरू कर दिया। इस बार मतदान के साथ ही खर्च का भी रिकॉर्ड बना है। प्रदेश की सभी 250 सीटों पर प्रत्याशियों ने पानी की तरह पैसा बहाया है। अनुमानत: 2200 करोड़ से अधिक रूपए चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा खर्च किए गए हैं। दरअसल, इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियां अपनी-अपनी सरकार बनने का दावा कर रही है। लेकिन एक बात तो तय है कि सरकार किसी की भी बने वह कर्ज पर ही चलेगी। इसकी बड़ी वजह यह है कि प्रदेश पर पहले से ही करीब सवा चार लाख करोड़ रूपए का कर्ज है। वहीं प्रदेश सरकार ने चुनावी साल में 50 हजार करोड़ से अधिक की घोषणाएं कर दी है। हालांकि, यह कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस के वादों का बिल इतना हो सकता है। ऐसे में नई सरकार को शासन चलाना मुश्किल भरा होगा। मप्र की 230 सदस्यीय विधानसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न होने के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर की गूंज पूरे प्रदेश में है। अगर 2018 के विधानसभा चुनाव नतीजे पर नजर डालें तो समझ आता है कि लोग क्यों कह रहे हैं कि पलड़ा इस वक्त किसी के भी पक्ष में झुक सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा (41.02 प्रतिशत) और कांग्रेस (40.89 प्रतिशत) दोनों का वोट शेयर लगभग समान था और सीटों का अंतर सिर्फ पांच था। भाजपा ने 230 में से 109 और कांग्रेस ने 114 सीटें जीती थीं। राज्य ने 2020 में जो राजनीतिक उथल-पुथल देखी, उसके बावजूद इस बार के चुनाव में कोई लहर या अंतर्धारा नहीं दिखी। मतदान प्रतिशत, जो भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है 77.15 प्रतिशत रहा, जो मौजूदा सरकार के लिए खतरे की घंटी बताई जा रही है। कई लोग इस भारी मतदान को राज्य में बदलाव का संकेत मान रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने चुनाव जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। दोनों पक्षों ने कई लोकलुभावन वादे किए। 50 हजार करोड़ के वादे प्रदेश पर एक तरफ जहां सवा चार लाख रोड़ रूपए का कर्ज है, वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 50 हजार करोड़ रूपए से अधिक की घोषणाएं कर चुके हैं। सीएम लाड़ली बहना योजना में हर साल 20 हजार करोड़ रुपये खर्च होने हैं। सीएम ने वादा किया है कि 1650 रुपये को बढ़ाकर हर महीना 3000 रुपये किया जाएगा। ऐसे में सिर्फ यही योजना बिल को 47 हजार करोड़ रुपये के पार ले जा रही है। इसके अलावा उन्होंने 450 रुपये में सिलेंडर और पीएम किसान सम्मान निधि में किसानों के लिए राज्य की तरफ से 6000 रुपये जोडऩे का वादा किया है। चुनावी घोषणाएं करने में कांग्रेस भी पीछे नहीं रही है। पूर्व मुख्यमंत्री और पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ ने 100 यूनिट्स तक मुफ्त बिजली और 100 यूनिट्स के बाद दरें आधी करने का वादा किया है। साथ ही पार्टी राज्य की सभी महिलाओं को 1500 रुपये हर महीने और 500 रुपये में सिलेंडर देने जा रही है। पुरानी पेंशन स्कीम यानी ओपीएस का वादा किया गया है। आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ महिलाओं को ही आर्थिक सहयोग देने में हर साल 24 हजार करोड़ रुपये का खर्च आएगा। बच्चों के लिए हुए ताजा ऐलान आंकड़े को 50 हजार करोड़ के पार पहुंचा देंगे। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने स्कूली बच्चों को हर महीना सहायता देने की बात कही है। चुनाव खर्च 2200 करोड़ के पार प्रदेश में इस बार के विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा 2200 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए जाने का अनुमान है। ये पैसा राजनीतिक दल और प्रत्याशी दोनों ने खर्च किए हैं। गौरतलब है कि इस बार चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों के खर्च की सीमा 40 लाख रूपए तय की थी। यह राशि 2018 में 28 लाख और 2013 में 16 लाख रूपए थी। इस खर्च में हवाई यात्राएं (सबसे ज्यादा खर्चीली), पेट्रोल-डीजल, नमकीन-मिठाई, होटल बिल, नेताओं की यात्रा, पब्लिक मीटिंग, मीडिया खर्च, विज्ञापन आदि शामिल है। चुनाव खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा एयर टैक्सी बिल का होता है। चुनाव आयोग ने भले ही एक प्रत्याशी के लिए 40 लाख रूपए खर्च की सीमा तय कर रखी थी, लेकिन कई प्रत्याशी एक दिन में 10 लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर रहे थे। यानी, चुनाव आयोग से तय 40 लाख रुपए की सीमा तो चार दिन में ही पार कर ली। इस हिसाब से प्रदेश की 230 सीटों में हर सीट पर तीन ऐसे प्रत्याशी रहे, जिन्होंने मोटी रकम खर्च की है। इन प्रत्याशियों का एक दिन का ही खर्च 70 करोड़ से ज्यादा का रहा, जबकि सप्ताहिक चुनाव खर्च के हिसाब में प्रत्याशियों ने 15-20 हजार रुपए ही बताया है। वहीं आयोग के अनुसार एक दिन का खर्च 11.50 करोड़ बैठता है। सबसे ज्यादा खर्च वाहन व ईंधन पर किया गया है। चुनाव कार्यालयों के प्रबंधन और खाने-पीने में मोटी रकम खर्च की गई है। कार्यकर्ताओं के वाहनों के किराये और ईंधन पर रोज 5 लाख खर्च किए गए।