राष्ट्रीय
06-Jan-2026
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गांधीनगर (ईएमएस)। सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों से निर्मित एक धार्मिक संरचना नहीं है, बल्कि यह भारत की उस प्राचीन सभ्यता की आत्मा का प्रतीक है, जिसने सहस्राब्दियों तक संघर्ष, आक्रमण और विनाश झेला, फिर भी अपनी पहचान नहीं खोई। यह मंदिर आस्था, स्मृति और समय के साथ भारतीय सभ्यता के अटूट संबंध की कहानी बताता है। सोमनाथ मंदिर को बार-बार नष्ट करने के प्रयास किए गए, लेकिन हर बार यह पहले से अधिक दृढ़ता और गौरव के साथ पुनः खड़ा हुआ। साल 2026 भारत के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। एक ओर यह 1026 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले बड़े आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने का वर्ष है, जब गजनी के महमूद ने पवित्र स्थल पर हमला किया था। दूसरी ओर, यह 1951 में आधुनिक सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की 75वीं वर्षगांठ यानी प्लेटिनम जुबली का वर्ष भी है। विनाश से पुनर्जागरण तक की यह हजार वर्षों की यात्रा भारत की जीवटता और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने लेख के माध्यम से इस ऐतिहासिक क्षण को स्मरण किया और इसके महत्व को रेखांकित किया। सोमनाथ संभवतः दुनिया का इकलौता ऐसा स्थल है जिसे बार-बार ध्वस्त किया गया, लेकिन हर बार उसका पुनर्निर्माण हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी के.एम. मुंशी ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘सोमनाथ: द श्राइन इटरनल’ में लिखा है कि सोमनाथ को सृष्टि जितना ही प्राचीन माना जाता है। उनके अनुसार, महमूद गजनवी 18 अक्टूबर 1025 को सोमनाथ की ओर बढ़ा और लगभग 80 दिनों की यात्रा के बाद 6 जनवरी 1026 को किलेबंद मंदिर नगरी पर आक्रमण किया। कहा जाता है कि मंदिर की रक्षा करते हुए करीब 50 हजार लोग मारे गए। गजनवी ने मंदिर को लूटा, गर्भगृह को अपवित्र किया और शिवलिंग को तोड़ दिया, लेकिन यह अंत नहीं था। फिर 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति अलाफ खान ने मंदिर को फिर नष्ट किया और मूर्ति के टुकड़े दिल्ली ले गया। इसके बाद हिंदू शासकों ने इस मंदिर को दोबारा खड़ा किया। 1394 में गुजरात के गवर्नर मुजफ्फर खान और 1459 में महमूद बेगड़ा ने भी सोमनाथ को अपवित्र किया। मुगल शासक औरंगजेब ने 1669 में मंदिर गिराने का आदेश दिया और 1702 में इस मंदिर को पूरी तरह नष्ट करने का फरमान जारी किया। 1706 में यहां मस्जिद बनाई गई, लेकिन श्रद्धा समाप्त नहीं हुई। 1783 में रानी अहिल्याबाई होलकर ने पास ही नया मंदिर बनवाया और शिवलिंग की रक्षा के लिए इस गुप्त रूप से स्थापित किया गया। इस पूरी कहानी में अल-बरूनी की गवाही भी बेहद अहम है। वह 11वीं सदी का फारसी विद्वान था, जो महमूद गजनवी के साथ भारत आया और करीब 13 साल यहीं रहा। उसने किताब-उल-हिंद नाम की किताब लिखी, जिसमें भारत के समाज, धर्म, विज्ञान और संस्कृति का बेहद ईमानदार वर्णन मिलता है। अल-बरूनी ने महमूद द्वारा मथुरा और सोमनाथ में की गई लूट और तबाही का जिक्र किया है। उसने लिखा कि इन हमलों से स्थानीय लोगों में मुसलमानों के प्रति नफरत पैदा हुई और हिंदू ज्ञान परंपराएं उन इलाकों से दूर चली गईं, जहां आक्रांताओं का कब्जा था। अल-बरूनी ने यह भी बताया कि सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं था, बल्कि एक बड़ा सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र था। यहां सोने के कलश, रत्नजड़ित मूर्तियां, अपार धन और विद्वानों, कलाकारों व व्यापारियों की मौजूदगी थी। यह मंदिर समुद्री व्यापार के बड़े केंद्र के रूप में भी जाना जाता था, जो भारत को अफ्रीका और चीन से जोड़ता था। 1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद जब सोमनाथ पहुंचे, तब वे इसकी कथा से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा था कि इसतरह के मंदिर भारत के इतिहास को पुस्तकों से कहीं अधिक गहराई से समझाते हैं—जो सौ बार टूटे और सौ बार फिर खड़े हुए। आजादी के बाद, 13 नवंबर 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की। उनके लिए यह धार्मिक राजनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रश्न था। विरोध के बावजूद 1951 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का उद्घाटन कर कहा कि अपनी सभ्यता और विरासत का सम्मान करना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ नहीं, बल्कि आत्मगौरव का प्रतीक है। आज सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवित संदेश है—कि जिन सभ्यताओं की जड़ें आस्था और आत्मविश्वास में होती हैं, उन्हें कभी पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता। यही सोमनाथ की असली पहचान है और यही भारत के भविष्य के लिए उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा। आशीष/ईएमएस 06 जनवरी 2026