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07-Jan-2026
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मप्र में साफ पानी सिर्फ सरकारी फाइलों और भाषणों तक सीमित, मप्र में जहर बन गया पीने का पानी! दुषित पानी: 5 साल में 18.93 लाख लोग बीमार -इंदौर में मौतें अब तक 20, प्रशासन 6 बता रहा, मुआवजा 18 को दिया भोपाल (ईएमएस)। मध्य प्रदेश में साफ पानी सिर्फ सरकारी फाइलों और भाषणों तक सीमित रह गया है। जमीनी हकीकत यह है कि राज्य में पीने का पानी ही लोगों की बीमारी और मौत की वजह बनता जा रहा है। मप्र राज्य जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य कार्य योजना 2022-27 के आंकड़े एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक सिर्फ 5 साल (2016 से 2020) में राज्य के 10 जिलों में 18 लाख 93 हजार 673 लोग पानी से होने वाली बीमारियों से प्रभावित हुए। ये सभी बीमारियाँ ऐसी हैं, जिन्हें समय रहते रोका जा सकता था, अगर प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती। उधर, इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से मौतों की संख्या 18 से बढक़र 20 हो गई है। सरकार ने हाईकोर्ट में पेश रिपोर्ट में सिर्फ चार मौतें होना माना है, जबकि 18 मृतकों के परिवारों को 2-2 लाख रुपए की सहायता दी जा चुकी है। प्रशासन ने परिजन को मुआवजा देने के लिए बनाई गई सूची में बुधवार को दो नए नाम जोड़े हैं। इनमें रामकली जगदीश और श्रवण नत्यु खुपराव शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि दूषित पानी से भले ही 6 लोगों की मौत हुई है, लेकिन जहां भी मौत की सूचना मिल रही है, वहां क्रॉस चेक कर आर्थिक सहायता दी जा रही है। इधर, जिस जगह ड्रेनेज लाइन का काम हुआ था, वहां बुधवार को नर्मदा लाइन चालू होते ही पानी लीक होकर कॉलोनी में भरने लगा। दुकानों में पानी घुस गया। पानी लीक होने के चलते नर्मदा लाइन को दोबारा बंद कर दिया गया है। 2019 में हालात सबसे बदतर आधिकारिक तालिका बताती है कि 2019 में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर रही। उस एक साल में ही भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, भिंड, मुरैना, विदिशा जैसे जिलों में 5 लाख 11 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए। डायरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस और दूसरी जलजनित बीमारियाँ लगातार लोगों को अपनी चपेट में लेती रहीं, लेकिन सरकार की तरफ से कोई ठोस सुधार नजर नहीं आया। हालांकि तालिका में इंदौर का नाम शामिल नहीं है, लेकिन हेल्थ डेटा और हालिया घटनाएं साफ संकेत देती हैं कि इंदौर, भोपाल, उज्जैन और ग्वालियर जैसे शहरी इलाकों में पानी की गुणवत्ता पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है। इंदौर में बीते वर्षों में दूषित पानी से बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े, मौतें हुईं और अस्पतालों पर दबाव बढ़ा, लेकिन नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही तय नहीं हुई। कैग पहले ही कर चुका था बड़ा खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट नंबर 3/2019 सरकार की पोल पहले ही खोल चुकी है। इस रिपोर्ट के अनुसार इंदौर और भोपाल नगर निगमों ने 8.95 लाख परिवारों को दूषित पेयजल सप्लाई किया। वहीं पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट ने 2013 से 2018 के बीच 5.45 लाख पानी से होने वाली बीमारियों के मामले खुद दर्ज किए। यानि सरकार को सब कुछ पता था, फिर भी हालात नहीं सुधरे। जांच हुई तो रिपोर्ट कहां है जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने सीधे तौर पर सरकार से सवाल पूछा है कि क्या कैग और स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के बाद प्रभावित परिवारों की कोई जांच की गई? अगर की गई है, तो उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और अगर नहीं की गई, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? साफ पानी नहीं तो बीमारी तय जन स्वास्थ्य अभियान का साफ कहना है कि अगर अब भी कठोर फैसले नहीं लिए गए, तो हजारों लोगों की जान हर साल ऐसे ही खतरे में पड़ती रहेगी। साफ और सुरक्षित पीने का पानी कोई योजना या नारा नहीं, बल्कि हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है। अब सवाल यह नहीं है कि समस्या क्या है, सवाल यह है कि सरकार कब जागेगी और कब जिम्मेदारी तय होगी। इंदौर दूषित पानी कांड पर सीएम डॉ. मोहन बोले हर मौत पीड़ादायक, हम आंकड़ों में नहीं पड़ रहे इंदौर में मौत के आंकड़ों और जिन्हें मुआवजा दिया गया है, उनकी संख्या में अंतर को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि हमारे लिए एक भी व्यक्ति की जान जाना कष्टदायक है। हम इसके आंकड़े में नहीं पड़ रहे हैं। ये अलग बात है कि प्रशासन की नजर में उनका अपना तरीका होता है। प्रशासन ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के आधार पर मृतकों की संख्या तय की है, लेकिन यह फाइनल नहीं है। सीएम यादव ने बुधवार को बीजेपी प्रदेश कार्यालय में कहा- नगर निगम के माध्यम से भी मृत्यु-पंजीयन होता है। जो भी संख्या सामने आएगी, राज्य सरकार संबंधितों के परिजन को राहत राशि देने का काम करेगी। सरकार हर पल प्रभावितों के साथ है।