नई दिल्ली (ईएमएस)। मानव शरीर एक निश्चित लय यानी रिदम के अनुसार कार्य करता है। जब यह लय संतुलित रहती है, तो बीमारियों का शरीर में प्रवेश कठिन हो जाता है। वैज्ञानिक इसे सर्कैडियन रिदम कहते हैं, जबकि आयुर्वेद में इसे दिनचर्या के रूप में जाना जाता है। आयुर्वेदिक दिनचर्या का पालन कर शरीर को न केवल मजबूत बनाया जा सकता है, बल्कि लंबे समय तक रोगमुक्त भी रखा जा सकता है। आयुर्वेद के अनुसार दिन की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में करना सबसे उत्तम माना गया है। सुबह जल्दी उठने से शरीर और मन दोनों में ताजगी बनी रहती है। शौच आदि के बाद तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में सहायक होता है। इसके बाद त्वचा और बालों की सेहत के लिए नाभि में तेल की कुछ बूंदें डालना लाभकारी माना गया है। आंखों की देखभाल के लिए अंजन करने की परंपरा भी आयुर्वेद में बताई गई है। सुबह के समय हल्का व्यायाम या सैर शरीर को सक्रिय बनाती है। इसके बाद अभ्यंग यानी पूरे शरीर में तेल मालिश करना बेहद जरूरी माना गया है। इससे रक्त संचार बेहतर होता है, मांसपेशियों की थकान दूर होती है और शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है। आयुर्वेद में आहार को जीवन का आधार माना गया है। भोजन केवल भूख मिटाने का साधन नहीं, बल्कि शरीर को ऊर्जा देने का प्रमुख स्रोत है। दोपहर का भोजन 12 से 1 बजे के बीच करना सबसे उपयुक्त बताया गया है, क्योंकि इस समय पाचन शक्ति यानी जठराग्नि सबसे मजबूत होती है और भोजन आसानी से पच जाता है। रात का भोजन हमेशा हल्का होना चाहिए और सूर्यास्त के बाद भोजन करने से यथासंभव बचना चाहिए। खाना खाने के बाद तुरंत लेटने की बजाय कुछ कदम टहलना या थोड़ी देर वज्रासन में बैठना पाचन के लिए फायदेमंद होता है। दिनचर्या का सबसे अहम हिस्सा नींद है। नींद के दौरान शरीर खुद की मरम्मत करता है और ऊर्जा को फिर से संचित करता है। रात को अच्छी और गहरी नींद के लिए दूध के साथ त्रिफला या हल्दी लेना उपयोगी माना गया है। सोते समय बाईं करवट में लेटना भी लाभकारी होता है, क्योंकि इससे रक्त संचार बेहतर रहता है और नींद गहरी आती है। सुदामा/ईएमएस 08 जनवरी 2026