16-Jan-2026
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- कांग्रेस ने लगाया आरोप, सरकार ने बताया बेबुनियाद नई दिल्ली (ईएमएस)। ईरान के रणनीतिक चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत की भूमिका एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गई है। कांग्रेस ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में चाबहार पोर्ट से भारत का कंट्रोल छोड़ दिया, जिससे देश की जनता के करीब 1100 करोड़ रुपये बर्बाद हो गए। हालांकि, सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि चाबहार पोर्ट से जुड़ी भारत की योजनाएं पूरी तरह जारी हैं। कांग्रेस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान जारी कर कहा कि मोदी सरकार ने चाबहार पोर्ट परियोजना में 120 मिलियन डॉलर यानी लगभग 1100 करोड़ रुपये का निवेश किया था। पार्टी का आरोप है कि अब भारत ने इस परियोजना से खुद को पीछे कर लिया है, जिससे यह राशि व्यर्थ हो गई। कांग्रेस का कहना है कि ट्रम्प प्रशासन के दबाव में भारत ने अपने रणनीतिक हितों से समझौता किया और चाबहार जैसे अहम प्रोजेक्ट से दूरी बना ली। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि चाबहार पोर्ट भारत के लिए केवल एक व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। इससे भारत को मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक सीधा पहुंच मार्ग मिलता है, जो अब खतरे में पड़ गया है। कांग्रेस के आरोपों पर विदेश मंत्रालय ने कड़ा जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि चाबहार पोर्ट से जुड़ी भारत की सभी योजनाएं जारी हैं और भारत इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका के साथ लगातार बातचीत कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कहना गलत है कि भारत ने चाबहार पोर्ट से कंट्रोल छोड़ दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद भारत को चाबहार पोर्ट परियोजना के लिए विशेष प्रतिबंध छूट दी हुई है। यह छूट 26 अप्रैल 2026 तक वैध है और इसके तहत भारत चाबहार से जुड़े कामकाज को जारी रख सकता है। भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार पोर्ट ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार का सीधा रास्ता देता है। इसके जरिए भारत अपना माल ईरान होते हुए अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और अन्य सेंट्रल एशियाई देशों तक पहुंचा सकता है। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत को समय और लागत दोनों में बचत होती है। इसके साथ ही यह परियोजना भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी नीति और ‘एक्ट सेंट्रल एशिया’ रणनीति का अहम हिस्सा मानी जाती है। अमेरिकी प्रतिबंध और नई चुनौती चाबहार पोर्ट को लेकर सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका के ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हैं। अमेरिका का मानना है कि ईरान बंदरगाहों, तेल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से मिलने वाली आय का इस्तेमाल अपने परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल विकास और पश्चिम एशिया में प्रभाव बढ़ाने के लिए करता है। इसी कारण अमेरिका ईरान की आय के प्रमुख स्रोतों पर दबाव बनाना चाहता है। 2018 में ईरान के परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद अमेरिका ने ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति अपनाई, जिसके तहत ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। हाल ही में 25 प्रतिशत टैरिफ की चेतावनी ने भी इस परियोजना को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। राजनीति बनाम रणनीति चाबहार पोर्ट को लेकर कांग्रेस और सरकार के बीच जारी यह विवाद आने वाले समय में और तेज हो सकता है। जहां विपक्ष इसे सरकार की विदेश नीति की विफलता बता रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि भारत अपने राष्ट्रीय और रणनीतिक हितों से कोई समझौता नहीं कर रहा है। चाबहार परियोजना भारत के लिए न केवल व्यापार, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन के लिहाज से भी अहम बनी हुई है।