-गैर-हिंदुओं की एंट्री बैन पर विवाद हैदराबाद,(ईएमएस)। हर की पैड़ी पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश और काम करने पर रोक से जुड़े विवाद पर एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे संविधान के खिलाफ बताया और ऐसी सोच को फासीवादी सोच करार दिया। ओवैसी ने कहा, कि उत्तराखंड से जुड़े इस गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान दिलाना उनकी जिम्मेदारी है, क्योंकि हाल के दिनों में ऐसे पोस्ट और बयान सामने आए हैं, जिनमें किसी खास इलाके या धार्मिक स्थल में नॉन-हिंदू लोगों के प्रवेश या काम करने पर प्रतिबंध की बात कही जा रही है। ओवैसी ने स्पष्ट रुप से कहा, इस तरह की सोच छुआछूत को बढ़ावा देती है और यह संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर ऐसे विचारों को कानून की तरह मान लिया गया, तो देश किस दिशा में जाएगा? उन्होंने कहा कि धर्म से जुड़े रीति-रिवाजों की अपनी सीमाएं होती हैं और हर धर्म के अपने नियम होते हैं, जिन्हें उसी धर्म के लोग निभाते हैं। लेकिन किसी पूरे इलाके में किसी समुदाय के प्रवेश पर रोक लगाना किस संवैधानिक आधार पर किया जा रहा है, यह स्पष्ट होना चाहिए। ओवैसी ने तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां यह नियम लंबे समय से चला आ रहा है कि काम करने वाले व्यक्ति को हिंदू धर्म को मानने का लिखित आश्वासन देना पड़ता है। लेकिन उन्होंने सवाल किया कि इस तरह की सोच को देशभर में लागू करने की कोशिश आखिर देश को कहां ले जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि असली मुद्दों, जैसे युवाओं को रोजगार और नौकरी देने से ध्यान भटकाया जा रहा है। उन्होंने उत्तराखंड में एंजेल चकमा की हत्या का भी जिक्र किया और कहा कि उस घटना को लेकर झूठी और गलत बातें फैलाई गईं। ओवैसी ने कहा कि एंजेल एक गरीब मजदूर था और उसके पिता बीएसएफ में सिपाही हैं, जो देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। इसके बावजूद उसकी हत्या को कुछ लोग जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। ओवैसी ने कहा कि यह नफरत की राजनीति है, जहां सिर्फ अलग दिखने की वजह से एक 22 साल के युवक की जान ले ली गई। उन्होंने सवाल उठाया कि जो लोग ऐसी फासीवादी सोच रखते हैं और चाहते हैं कि सब उनकी तरह ही रहें, उन्हें यह अधिकार किसने दिया। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चिंता यह है कि एक इंसान की हत्या के बाद भी समाज का बड़ा हिस्सा चुप है। हिदायत/ईएमएस 17जनवरी26