18-Jan-2026
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लंदन(ईएमएस)। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर इस वक्त अपनी ही विदेश नीति और बयानों के जटिल जाल में फंसते नजर आ रहे हैं। एक तरफ वे ग्रीनलैंड पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावे का खुलकर विरोध कर रहे हैं और संप्रभुता का हवाला दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चागोस आइलैंड को लेकर उनके द्वारा लिए गए फैसलों पर वैश्विक स्तर पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। स्टार्मर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क के किंगडम का अभिन्न हिस्सा है और इसका भविष्य केवल वहां के लोग और डेनमार्क की सरकार ही तय कर सकते हैं, कोई तीसरा देश नहीं। लेकिन उनके इस सिद्धांतवादी रुख ने सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय मामलों में दोहरे मापदंड अपना रहा है? रणनीतिक विश्लेषक और आलोचक पूछ रहे हैं कि यदि किसी क्षेत्र की संप्रभुता और वहां के लोगों की इच्छा इतनी ही सर्वोपरि है, तो चागोस आइलैंड मॉरिशस को सौंपने के समझौते से पहले वहां के मूल निवासियों से राय क्यों नहीं ली गई? स्टार्मर की यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है, बल्कि यह उनकी विदेश नीति की उन दरारों को उजागर करती है जो सत्ता में आने के बाद से लगातार गहरी होती गई हैं। नाटो, अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय अखंडता की दुहाई देने वाले स्टार्मर ने चागोस के मामले में उन्हीं सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया, जिनका वे आज ग्रीनलैंड के संदर्भ में समर्थन कर रहे हैं। ग्रीनलैंड पर कड़ा रुख अपनाकर वे अमेरिका से सीधे टकराव की स्थिति में आ गए हैं, लेकिन चागोस का पिछला रिकॉर्ड उनकी नैतिक दलीलों को कमजोर कर रहा है। चागोस आइलैंड का मुद्दा दशकों पुराना और संवेदनशील है। हिंद महासागर में स्थित इस रणनीतिक द्वीपसमूह से 1960 और 70 के दशक में ब्रिटेन ने मूल निवासियों को जबरन बेदखल कर दिया था ताकि अमेरिका वहां डिएगो गार्सिया जैसा विशाल सैन्य बेस बना सके। 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने ब्रिटेन के कब्जे को अवैध घोषित किया था। 2024 में स्टार्मर सरकार ने ऐतिहासिक बदलाव करते हुए इसे मॉरिशस को सौंपने का निर्णय तो लिया, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में न तो चागोसियन लोगों की सहमति को प्राथमिकता दी गई और न ही सुरक्षा चिंताओं को पारदर्शी तरीके से साझा किया गया। अब जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर नाटो सहयोगियों पर टैरिफ लगाने की धमकी दी है, तो स्टार्मर ने इसे पूरी तरह गलत बताते हुए आर्कटिक सुरक्षा के लिए रूस के खतरे से मिलकर निपटने की बात कही है। ब्रिटेन, स्वीडन, फ्रांस और डेनमार्क सहित पूरा यूरोपीय संघ इस वक्त ट्रंप की टैरिफ कूटनीति के खिलाफ एकजुट है। लेकिन स्टार्मर के लिए चुनौती दोहरी है। उन्हें एक तरफ अमेरिका जैसे शक्तिशाली सहयोगी के साथ संबंधों को संतुलित करना है और दूसरी तरफ अपनी खोती हुई कूटनीतिक विश्वसनीयता को बहाल करना है। आलोचकों का मानना है कि स्टार्मर एक तरफ अंतरराष्ट्रीय कानूनों की दुहाई देते हैं, लेकिन चागोस जैसे मामलों में उनकी नीति असंगत दिखती है। यही कारण है कि उन्हें एक्सेस ओवर अलायंस की राजनीति करने वाला नेता कहा जा रहा है। ग्रीनलैंड पर सख्त स्टैंड लेकर उन्होंने खुद को नैतिक रूप से सही साबित करने की कोशिश तो की है, लेकिन चागोस आइलैंड के विवादित फैसले उनकी इस नैतिकता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। यह मुद्दा अब केवल दो द्वीपों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ब्रिटेन की भविष्य की विदेश नीति की विश्वसनीयता की एक बड़ी परीक्षा बन चुका है। वीरेंद्र/ईएमएस/18जनवरी2026