ओस्लो,(ईएमएस)। दुनिया के नक्शे पर जहां इंसानी बस्तियां खत्म हो जाती हैं और अंतहीन बर्फ का साम्राज्य शुरू होता है, वहां नॉर्वे का सुदूर लॉन्गइयरबायेन द्वीप स्थित है। हाड़ कंपा देने वाली सर्द हवाओं और ध्रुवीय भालुओं के साये में बसे इस उजाड़ पहाड़ के भीतर दुनिया का सबसे सुरक्षित सेफ हाउस बनाया गया है। इसे डूम्स डे वॉल्ट या प्रलय की तिजोरी कहा जाता है। यह कोई साधारण गोदाम नहीं, बल्कि मानवता की विरासत को सुरक्षित रखने का एक वैश्विक मिशन है, जहां अब बीजों के साथ-साथ हमारी डिजिटल सभ्यता का बैकअप भी जमा किया जा रहा है। शुरुआत में इसे ग्लोबल सीड वॉल्ट के रूप में तैयार किया गया था, ताकि किसी वैश्विक आपदा की स्थिति में फसलों को दोबारा उगाया जा सके। लेकिन अब इसी पहाड़ की गहराई में आर्कटिक वर्ल्ड आर्काइव (एडब्ल्यूए) बनाया गया है। यहां दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल कोड्स, सॉफ्टवेयर और सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजा जा रहा है। एलन मस्क और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के कोडिंग डेटा से लेकर गिटहब के ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर तक, सब कुछ यहां सुरक्षित है। मकसद साफ है—अगर कभी वैश्विक डिजिटल ब्लैकआउट होता है, तो तकनीक को फिर से खड़ा करने का सोर्स कोड मौजूद रहे। इस बर्फीली तिजोरी में भारत की मौजूदगी रणनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद प्रभावशाली है। भारत ने यहां अपनी सांस्कृतिक आत्मा को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया है। विश्व प्रसिद्ध ताजमहल का संपूर्ण डिजिटल ब्लूप्रिंट और 3डी लेजर स्कैन यहां कैद है, ताकि भविष्य की सभ्यताएं इसके एक-एक पत्थर की नक्काशी को मिलीमीटर की सटीकता से समझ सकें। इसके साथ ही भारत का संविधान, प्राचीन पांडुलिपियां और इसरो के ऐतिहासिक अंतरिक्ष मिशनों का डेटा भी माइनस 18 डिग्री तापमान में सुरक्षित रखा गया है। कृषि के क्षेत्र में भी भारत का योगदान अतुलनीय है। हैदराबाद स्थित आईसीआरआईएसएटी और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के माध्यम से यहां 1,10,000 से अधिक बीजों के नमूने जमा किए गए हैं। इनमें विशेष रूप से भारत के श्रीअन्न यानी मिलेट्स (ज्वार, बाजरा, रागी) शामिल हैं, जो सूखे और भीषण गर्मी में भी उगने की क्षमता रखते हैं। भारत की ओर से भेजे गए इन डिब्बों पर ब्लैक बॉक्स की मोहर होती है, जिसका अर्थ है कि भारत की अनुमति के बिना कोई भी देश इन्हें खोल नहीं सकता। तकनीकी रूप से यह आर्काइव किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह पूरी तरह ऑफलाइन है, जिससे इसे किसी भी हैकर या वायरस से खतरा नहीं है। जहां साधारण हार्ड डिस्क 10-15 साल में खराब हो सकती है, वहीं टेप बिना बिजली के 1,000 साल तक डेटा सुरक्षित रख सकते हैं। यह डेटा को हाई-डेंसिटी फिल्म पर बाइनरी कोड में अंकित करता है, जिसे भविष्य में किसी सॉफ्टवेयर के बिना सिर्फ एक लेंस और रोशनी की मदद से पढ़ा जा सकेगा।पहाड़ की प्राकृतिक बर्फ (परमाफ्रॉस्ट) इस तिजोरी के लिए कुदरती एयर-कंडीशनर का काम करती है। यदि कभी दुनिया की बिजली पूरी तरह खत्म हो जाए, तब भी यह स्थान सदियों तक ठंडा रहेगा। यहां वेटिकन के गुप्त दस्तावेज और मोना लिसा जैसी महान कलाकृतियां भी इसी भरोसे पर रखी गई हैं। यह वॉल्ट इस बात का प्रमाण है कि जब अस्तित्व का संकट आता है, तो पूरी मानवता एक हो जाती है; यहां कट्टर प्रतिद्वंद्वी देशों के बीज और डेटा भी एक-दूसरे के बगल में शांति से रखे हुए हैं। यह गुफा भविष्य के लिए पृथ्वी का रिसेट बटन है। वीरेंद्र/ईएमएस/01फरवरी2026