हाल ही में राज्यसभा में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की ओर से जो जानकारी राज्यसभा में दी गई है। उसके आंकड़ों ने एक बार फिर भारतीय प्रशासनिक ढांचे में प्रतिनिधित्व के सवाल को विवाद में लाकर खड़ा कर दिया है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने संसद में अखिल भारतीय सेवाओं—आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के अधिकारियों की सामाजिक श्रेणीवार जानकारी संख्या के साथ प्रस्तुत की है। यह आंकड़े सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार 01 जनवरी, 2025 की स्थिति में आईएएस के 6877 पद में 5577 की नियुक्ति है। इसमें ओबीसी के 245, एससी के 135, एसटी के 67 अधिकारी हैं। 1300 पद खाली पड़े हैं। 5577 पदों में 5130 पद सामान्य वर्ग के हैं। एसटी, एससी, पिछड़ा वर्ग के मात्र 447 अधिकारी हैं। इसका मतलब है यूपीएससी की नियुक्ति में आरक्षण का पालन नहीं किया जा रहा है। 1300 पद खाली हैं। इसके बाद भी आईएएस के पदों के समकक्ष सरकार संविदा में नियुक्ति कर रही है। राहुल गांधी ने आरक्षण को लेकर जो बात कही थी। उक्त आंकड़े उनकी बात की पुष्टि करते हुए नजर आ रहे हैं। भारतीय सेवा में जो अधिकारी नियुक्त हैं आरक्षण होने के बाद भी एसटी ,एससी और ओबीसी वर्ग की जातियों को प्रति निधित्व नहीं मिला है। आंकड़ों के अनुसार स्वीकृत पदों और वास्तविक तैनाती में भारी अंतर है। भारतीय सेवा में आईएएस, आईपीएस, आईएफएस का चयन यूपीएससी के माध्यम से नियुक्ति होती है। उस नियुक्ति में आरक्षित वर्ग जिसमें पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों की हिस्सेदारी उनकी जनसंख्या के अनुपात की तुलना में ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। यह स्थिति तब है, जब संविधान प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था, लागू है। आरक्षण का उद्देश्य प्रशासनिक ढांचे में सामाजिक न्याय और समावेशिता सुनिश्चित करने का संवैधानिक प्रावधान है। प्रश्न यह नहीं है, किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व अधिक है या कम है। प्रश्न यह है आरक्षण की नीति अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त कर पा रही है? यदि हजारों पद वर्षों तक रिक्त पड़े हैं। जो नियुक्तियां की गई है उनमें आरक्षण का पालन नहीं किया गया है। स्वाभाविक है, इससे आरक्षित वर्गों की भागीदारी प्रभावित होगी। रिक्तियों को समय पर न भरना, नियुक्ति करते समय आरक्षण का पालन नहीं करना, केवल प्रशासनिक अक्षमता का मामला नही है। यह सामाजिक एवं राजनीतिक संतुलन से भी जुड़ा है। राहुल गांधी जिस तरह से जाति जनगणना की मांग मांग कर रहे हैं। राहुल गांधी और विपक्षी दलों की इस मांग को खारिज करना तर्कसंगत नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में 80:20 को लेकर हिंदुओं और धार्मिक संदर्भ में धुव्रीकरण का जो प्रयास हुआ है। यदि हिंदुओं के एक बहुत बड़े वर्ग जिसमें एसटी, एससी और पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में 80% हिंदुओं को एकजुट नहीं रखा जा सकता है। नीति निर्माण सटीक आंकड़ों और पारदर्शिता पर आधारित होना चाहिए। यदि सरकार के पास अद्यतन और विस्तृत सामाजिक-आर्थिक डेटा उपलब्ध नहीं होगा,तो सरकार समान प्रतिनिधित्व, अवसरों और संसाधनों के वितरण पर किस तरह से प्रभावी निर्णय ले सकेगी? जाति जनगणना का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि वास्तविक स्थिति को समझना और नीति को अधिक न्यायसंगत बनाना है। जाति जनगणना को राजनीतिक दलों को हथियार नहीं बनना चाहिए। जाति जनगणना के आंकड़ों का उपयोग बेहतर सामाजिक व्यवस्था को विकसित करना मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि इतना संवेदनशील मामला भावनात्मक या टकरावपूर्ण बहस में ना बदला जाए। नाही इसका राजनीतिक कारणों में उपयोग होना चाहिए। जाति जनगणना के माध्यम से सभी वर्गों के लिए प्रशासन की गुणवत्ता, योग्यता और सभी वर्गों के सार्वजनिक हित सर्वोपरि प्राथमिकता के लिए होना चाहिए। सामाजिक प्रतिनिधित्व को सभी वर्गों के उत्थान राजनीतिक एवं प्रशासनिक क्षमता में उचित प्रतिनिधित्व का संतुलन ही लोकतंत्र को मजबूत बनाएगा। जो जानकारी राज्यसभा के माध्यम से सामने आई है। उसके बाद सवाल यही है, क्या वर्तमान व्यवस्था सामाजिक न्याय के लक्ष्य के अनुरूप है? यदि नहीं, तो सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाना समय की मांग है। संसद में रखे गए आंकड़े बहस का आधार अवश्य बन सकते हैं। समाधान, व्यापक संवाद, पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही संभव है। जाति एवं आर्थिक जनगणना के माध्यम से जो जानकारी मिलेगी उसके अनुसार सरकार अपनी नीतियां बनाये। भारत में जो वर्ग आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर है। उसको मुख्य धारा में लाने के लिए सभी राजनीतिक दल, केंद्र एवं राज्य सरकारें बिना किसी भेदभाव के उन्हें आगे बढ़ाने में मदद करें, तभी सही मायने में बेहतर सामाजिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हो सकेगी। जाति जनगणना का मामला अब इतना आगे बढ़ गया है। यदि इसे 2027 की जनगणना में उसे शामिल नहीं किया गया, तो हिंदुओं को एकजुट रख पाना मुश्किल होगा। पिछले 12 वर्षों में सरकार ने धार्मिक धुव्रीकरण को लेकर जो जन जागृति पैदा की है। उसमें हिंदुओं के सभी वर्गों को जोड़े रखने के लिए जाति जनगणना समय की मांग है। राज्यसभा में जिस तरह की जानकारी आई है, उसके बाद भी जाति जनगणना का निर्णय सरकार द्वारा नहीं लिया गया। ऐसी स्थिति में इसके दुष्परिणाम एसटी ,एससी पिछडा वर्ग, अल्पसंख्यक और सामान्य वर्ग के बीच का टकराव बढ़ना तय है। केंद्र सरकार ने अभी तक जाति जनगणना के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया है। जिसके कारण हिंदुओं के विभिन्न जाति समुदाय में टकराव रहा है। ईएमएस/18/02/2026