राष्ट्रीय
19-Feb-2026
...


मुंबई,(ईएमएस)। महाराष्ट्र की महायुति सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के 2014 के पुराने आदेश को औपचारिक रूप से रद्द करने के फैसले ने राज्य की राजनीति में नया उबाल ला दिया है। जहाँ सत्ता पक्ष इसे केवल एक कानूनी और प्रक्रियात्मक औपचारिकता बता रहा है, वहीं विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस ने इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार दिया है। यह विवाद 2014 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले शुरू हुआ था, जब तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय को विशेष पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत 5 प्रतिशत आरक्षण दिया था। इस नीति को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसने मराठा आरक्षण को तो खारिज कर दिया था, लेकिन शैक्षणिक संस्थानों में मुस्लिम आरक्षण को आंशिक रूप से बरकरार रखा था। हालांकि, बाद में आई भाजपा-शिवसेना सरकार ने इस अध्यादेश को कानून का रूप नहीं दिया, जिससे यह समय सीमा समाप्त होने के बाद निष्प्रभावी हो गया था। अब वर्तमान सरकार ने उसी पुराने आदेश (जीआर) को आधिकारिक रूप से रद्द करने का प्रस्ताव जारी किया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों से शपथ के समय सभी के प्रति निष्पक्ष रहने और संविधान का पालन करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें ऐसा नहीं कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जब उच्च न्यायालय ने कोटे के पक्ष में फैसला सुनाया था, तब भी इसे रद्द करना सरकार की भेदभावपूर्ण मानसिकता को दर्शाता है। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का तर्क है कि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता और 2014 का वह आदेश तकनीकी रूप से पहले ही खत्म हो चुका था। इस पूरे घटनाक्रम में उद्धव बालासाहेब ठाकरे (यूबीटी) शिवसेना का रुख चर्चा का विषय बना हुआ है। हाल के महीनों में अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति नरम रुख दिखाने वाली पार्टी ने इस मुद्दे पर फिलहाल चुप्पी साध रखी है। पार्टी सांसद संजय राउत ने केवल इतना कहा कि इस विषय पर बाहर चर्चा करने के बजाय आगामी विधानसभा सत्र में अपनी बात रखी जाएगी। वहीं, शरद पवार नीत राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध किया है। विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही आरक्षण का यह मुद्दा राज्य में ध्रुवीकरण और तीखी राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। वीरेंद्र/ईएमएस/19फरवरी2026 -----------------------------------