लेख
25-Feb-2026
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संसार के सभी धर्मों और दार्शनिक परंपराओं ने मानव जीवन को अत्यंत मूल्यवान माना है। केवल शरीर धारण कर लेना ही मनुष्य होने का प्रमाण नहीं है बल्कि उसके भीतर करुणा सेवा त्याग विनम्रता और सत्यनिष्ठा जैसे मानवीय गुणों का विकास होना आवश्यक है। जब ये गुण जीवन में सुवासित होते हैं तभी जीवन की सच्ची सौरभ प्रकट होती है। आज जब चारों ओर भौतिक उपलब्धियों की चमक दिखाई देती है तब भी समाज के भीतर एक खालीपन अनुभव किया जा रहा है। यह खालीपन मानवता के क्षरण का संकेत है। ऐसे समय में मानवता के मूल्यों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के दुख को अपना दुख समझे। एक बार मारवाड़ में भीषण अकाल पड़ा। जनता भूख और प्यास से तड़प रही थी। राजा ने राजकोष खोलकर जनता की सहायता की। जब कोष खाली हो गया तो उसने अपनी बहुमूल्य अंगूठी तक बेचकर प्रजा के लिए अन्न और पानी की व्यवस्था करवाई। यह घटना केवल उदारता का उदाहरण नहीं है बल्कि यह मानवता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। एक शासक का यह भाव कि कोई भी आभूषण मनुष्य के प्राणों से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकता। हमें यह सिखाता है कि त्याग ही सच्चे नेतृत्व का आधार है। यही भावना किसी भी समाज को महान बनाती है। मानवता का अर्थ केवल दया दिखाना नहीं है बल्कि यह एक व्यापक जीवन दृष्टि है। सेवाभाव विनम्रता चारित्रिक दृढ़ता त्याग और निर्व्यसनता जैसे गुण मानव जीवन को सार्थक बनाते हैं। यदि किसी के जीवन में परोपकार की भावना जागृत हो जाए तो समाज की अनेक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं। किसी को कष्ट पहुँचाना अमानवीयता है जबकि पीड़ित को सहारा देना मानवीयता का सर्वोत्तम रूप है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दूसरों की टांग तोड़ने के बजाय टूटे हुए मनों को जोड़ने का प्रयास करें। आँसुओं के स्थान पर मुस्कान के सुमन बिखेरना ही सच्चा मानवीय कर्म है। स्वतंत्रता के बाद देश ने अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं परंतु जीवन मूल्यों का जो ह्रास हुआ है वह चिंताजनक है। लोकतंत्र के प्रति विश्वास डगमगाया है। राजनीति में नैतिकता का अभाव दिखाई देता है। समाज में स्वार्थ और भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं। प्राकृतिक आपदाएँ हों या सामाजिक संकट हर क्षेत्र में असंतुलन झलकता है। इसका मूल कारण यही है कि हम मानव होते हुए भी मानवीय भावों से दूर हो गए हैं। जब व्यक्ति अपने हित को सर्वोपरि मान लेता है तब समाज का संतुलन बिगड़ जाता है। इसलिए आत्ममंथन आवश्यक है कि कहीं हम अपने मूल्यों से भटक तो नहीं गए हैं। भारत की भूमि ने ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया जिन्होंने मानवता को जीवन का सर्वोच्च आदर्श माना। महावीर ने अहिंसा का संदेश दिया। गौतम बुद्ध ने करुणा और मध्यम मार्ग का उपदेश दिया। महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा को जीवन का आधार बनाया। राम और कृष्ण के जीवन चरित्र में भी कर्तव्यपरायणता और लोकमंगल की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। इन महापुरुषों ने केवल उपदेश नहीं दिए बल्कि अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। आज हम उनके नाम का जयघोष तो करते हैं पर उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का प्रयास कम करते हैं। यही विसंगति हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है। मानवता का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वावलंबन भी है। दूसरों के कंधों पर चलकर कोई भी अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच सकता। हमारे महापुरुषों ने अपने जीवन में परिश्रम और आत्मनिर्भरता को महत्व दिया। राम ने वनवास के समय अपनी कुटिया स्वयं बनाई। कृष्ण ने गुरु के आश्रम में रहते हुए श्रम को सम्मान दिया। महात्मा गांधी ने आश्रम जीवन में आत्मनिर्भरता की शिक्षा दी। आज के युग में जब सुविधाएँ बढ़ी हैं तब परिश्रम का महत्व कम होता जा रहा है। पश्चिमी देशों की प्रगति का एक बड़ा कारण वहाँ के नागरिकों का श्रमशील और अनुशासित होना है। यदि हमें सशक्त समाज का निर्माण करना है तो हमें भी श्रम और स्वावलंबन को जीवन का अंग बनाना होगा। शिक्षा का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यालय और विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर माने जाते हैं जहाँ प्रवेश ज्ञान के लिए और प्रस्थान सेवा के लिए होना चाहिए। परंतु आज की शिक्षा व्यवस्था में मूल्यों की शिक्षा गौण होती जा रही है। केवल डिग्री प्राप्त करना ही उद्देश्य बन गया है। जब शिक्षा चरित्र निर्माण के बजाय केवल रोजगार का साधन बन जाए तो समाज में नैतिक संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो विद्यार्थियों में संवेदनशीलता कर्तव्यबोध और राष्ट्रप्रेम जागृत करे। ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य मानव को देवत्व के समान आदर देना सिखाना है। यदि शिक्षा यह नहीं सिखा पा रही तो उसमें सुधार की आवश्यकता है। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में मानव ने अद्भुत प्रगति की है। जल थल और नभ में उसके चमत्कार दिखाई देते हैं। अंतरिक्ष की यात्राएँ हों या डिजिटल क्रांति हर ओर मानव बुद्धि की विजय दिखाई देती है। परंतु विडंबना यह है कि उसने सब कुछ बनाना सीख लिया पर स्वयं मानव बनकर रहना नहीं सीखा। यदि विज्ञान का उपयोग मानव कल्याण के लिए न हो तो वह विनाश का कारण भी बन सकता है। इसलिए आवश्यक है कि तकनीकी प्रगति के साथ साथ नैतिक चेतना का विकास भी हो। अभी भी समय है कि हम जीवन मूल्यों की सौरभ को पुनः जागृत करें। विनम्रता सभ्यता और परोपकार के बीज यदि हमारे हृदय में अंकुरित हों तो समाज में मानवीयता के पुष्प खिल सकते हैं। जब व्यक्ति अपने व्यवहार में प्रेम और करुणा को स्थान देता है तब उसके आसपास का वातावरण भी सुगंधित हो उठता है। ज्ञान का नव सूर्योदय तभी संभव है जब हम सत्य और नैतिकता को जीवन का आधार बनाएँ। प्रेम की वीणा से निकले मधुर स्वर ही मानवता का नाद बन सकते हैं। मानवता कोई उपदेश मात्र नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की शैली है। यह हमें सिखाती है कि हमारा अस्तित्व दूसरों से जुड़ा है। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान नहीं आती तब तक हमारी प्रगति अधूरी है। इसलिए हमें अपने भीतर झांककर यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने आचरण से मानवता की रक्षा करेंगे। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर थोड़ा सा भी त्याग और सेवा का भाव जागृत करे तो समाज में परिवर्तन अवश्य आएगा। जीवन की सच्ची सौरभ बाहरी आभूषणों में नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों में छिपी है। इन्हीं मूल्यों का पुनर्जागरण हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ईएमएस/25/02/2026