उज्जैन(ईएमएस)। खगोलीय और धार्मिक दृष्टि से साल 2026 का पहला चंद्रग्रहण 3 मार्च को लगने जा रहा है। यह ग्रहण भारत में दृश्यमान होगा, जिसके कारण यहाँ सूतक काल के नियम और परंपराएं पूरी तरह प्रभावी रहेंगी। उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज के अनुसार, ग्रहण की अवधि सामान्य समय से भिन्न होती है क्योंकि इस दौरान ब्रह्मांडीय ऊर्जा में नकारात्मकता का संचार बढ़ जाता है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं के लिए यह समय अत्यंत संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ग्रहण का सीधा प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य और विकास पर पड़ सकता है। ज्योतिषाचार्य ने स्पष्ट किया है कि ग्रहण के दौरान चंद्रमा से निकलने वाली किरणें शुभ नहीं मानी जातीं, इसलिए गर्भवती महिलाओं को सीधे चंद्र प्रकाश में जाने से बचना चाहिए और अनावश्यक रूप से घर से बाहर निकलने से परहेज करना चाहिए। पंचांगीय गणना के अनुसार, 3 मार्च 2026 को चंद्रग्रहण का प्रभाव दोपहर 3:19 बजे से शुरू होकर शाम 6:47 बजे तक रहेगा। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, चंद्रग्रहण से 9 से 12 घंटे पूर्व ही सूतक काल प्रारंभ हो जाता है, जिस दौरान शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है और मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। ज्योतिषाचार्य ने परामर्श दिया है कि यद्यपि सूतक काल में भोजन वर्जित होता है, लेकिन बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों के लिए सुबह 6:30 से 9:30 बजे तक भोजन की छूट रहेगी। इसके पश्चात, दिन और शाम के समय सभी को संयम बरतते हुए भजन-कीर्तन और ईश्वर स्मरण में समय व्यतीत करना चाहिए। गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी करते हुए आचार्य ने बताया कि ग्रहण काल के दौरान भोजन पकाना या ग्रहण करना हानिकारक हो सकता है। माना जाता है कि ग्रहण की किरणों से खाद्य पदार्थ दूषित हो जाते हैं, इसलिए ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान करके ही शुद्ध भोजन ग्रहण करना उचित है। इसके अतिरिक्त, इस अवधि में सुई, चाकू, कैंची या किसी भी नुकीली वस्तु का प्रयोग वर्जित माना गया है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इन वस्तुओं का उपयोग गर्भस्थ शिशु को शारीरिक दोष पहुंचा सकता है। सिलाई-बुनाई जैसे कार्यों से भी इस समय दूर रहने की सलाह दी गई है। वीरेंद्र/ईएमएस 26 फरवरी 2026