भोपाल(ईएमएस)। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य,गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि संभावना का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 01 मार्च, 2026 को शिवचरण कुशराम एवं साथी, डिण्डोरी द्वारा गोण्ड जनजातीय करमा नृत्य, रहीस सिंह यादव एवं साथी, अशोकनगर द्वारा राई नृत्य, अरविंद पटेल एवं साथी, सीधी द्वारा फगुआ गायन, जयंत विश्वकर्मा एवं साथी, सागर द्वारा फाग गायन, मणिराज कोल एवं साथी, सीधी द्वारा फाग गायन की प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम में अरविंद पटेल एवं साथी, सीधी द्वारा फगुआ गायन की प्रस्तुति दी गई। उन्होंने बुंदेली- अरे हा हो देवी तोहरे सरन,,,,लेजन- बसिया बाजै हो नचाइ नंद का लाला,,,, बैसवारा- हरिये कोयलिया बोलै,,,,,,,डग्गा- गगरिया मोरी न फोरो लाल नहि देवई हजारों गार,,,,चौताल कहे बिप्र सुदामा की नारी,,,फगुआ- सूरदास जी एवं राई .. होली की उमंग गायन किया। वहीं जयंत विश्वकर्मा एवं साथी, सागर द्वारा फाग गायन किया गया। उन्होंने सुमरली,,,,प्रेम रंग बरसे अँगनवा,,,सुनी लगे जा होरी,,,,मोपे रंगा ने डरो एवं सदाशिव खेले मसाने में होरी गीतों की प्रस्तुति दी। गोण्ड जनजातीय करमा नृत्य करमा कर्म की प्रेरणा देने वाला नृत्य है।ग्रामवासियों में श्रम का महत्व है श्रम को ही ये कर्म देवता के रूप में मानते हैं। पूर्वी मध्यप्रदेश में कर्म पूजा का उत्सव मनाया जाता है। उसमें करमा नृत्य किया जाता है परन्तु विन्ध्य और सतपुड़ा क्षेत्र में बसने वाले जनजातीय कर्म पूजा का आयोजन नहीं करते। नृत्य में युवक-युवतियाँ दोनों भाग लेते हैं, दोनों के बीच गीत रचना की होड़ लग जाती है। वर्षा को छोड़कर प्रायः सभी ऋतुओं में गोंड जनजातीय करमा नृत्य करते हैं। यह नृत्य जीवन की व्यापक गतिविधि के बीच विकसित होता है, यही कारण है कि करमा गीतों में बहुत विविधता है। वे किसी एक भाव या स्थिति के गीत नहीं है उसमें रोजमर्रा की जीवन स्थितियों के साथ ही प्रेम का गहरा सूक्ष्म भाव भी अभिव्यक्त हो सकता है। मध्यप्रदेश में करमा नृत्य-गीत का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। सुदूर छत्तीसगढ़ से लगाकर मंडला के गोंड और बैगा जनजातियों तक इसका विस्तार मिलता है। राई नृत्य बुन्देलखण्ड अंचल की अपनी जातीय परम्परा मूलतः शौर्य और श्रृंगार परक है। यह अकारण नहीं है कि बुन्देलखण्ड के प्रख्यात लोकनृत्य राई में एक ओर तीव्र शारीरिक चपलता, बेग, अंग, मुद्राएं और समूहन के लयात्मक विन्यास है, वहीं दूसरी ओर नृत्य के लास्य का समावेश और लोक कविता के रूप में उद्याम श्रृंगार परक अर्थों की नियोजना। उसमें ऊर्जा, शक्ति और लालित्य एकमेक है। इस नृत्य को बुन्देलखण्ड में मंचीय नृत्य की स्थिति मात्र में सीमित नहीं किया गया है। बल्कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे के जन्म के समय और विवाह के अवसर पर राई नृत्य का आयोजन प्रतिष्ठा मूलक माना जाता है। अनेक बार किसी अभीप्सित कार्य की पूर्ति होने या मनौती होने पर भी राई के आयोजन किये जाते हैं। राई एक जीवन्त कलात्मक हिस्सेदारी की तरह ही है। जीवन का अटूट हिस्सा जिसमें आनंद की स्वच्छंद अभिव्यक्ति मनुष्य की जीवनी शक्ति जैसा प्रकट होता है। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय़ में हर रविवार दोपहर 02 बजे से आयोजित होने वाली इस गतिविधि में मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति के साथ ही देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होगा। हरि प्रसाद पाल / 01 मार्च, 2026