राष्ट्रीय
19-Mar-2026
...


नई दिल्ली(ईएमएस)। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरुर लगातार कांग्रेस के खिलाफ बयान दे रहे हैं। कई मौकों पर उन्होंने तंस भी कसे हैं। इस बार कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी पर पलटवार किया है। सोनिया गांधी ने हाल ही में एक लेख के माध्यम से सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन और उसके राष्ट्राध्यक्ष की हत्या पर नई दिल्ली की खामोशी भारत की विदेश नीति की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में खड़े होने के अवसर को गंवाने जैसा बताया था। इसके जवाब में थरुर ने कहा है कि जंग पर सरकार की चुप्पी मोरल सरेंडर नहीं हो सकती। पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद भारत सरकार के रुख को लेकर देश की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आ रही है। जहाँ पार्टी की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने सरकार की चुप्पी की तीखी आलोचना की है, वहीं तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने सरकार के इस कदम को एक सोची-समझी और जिम्मेदार कूटनीति (रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट) करार दिया है। हालांकि, पूर्व राजनयिक और कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इस आलोचना से असहमति जताते हुए एक अलग दृष्टिकोण पेश किया है। थरूर का तर्क है कि भारत की चुप्पी कोई नैतिक आत्मसमर्पण नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अपनाया गया एक व्यावहारिक संतुलन है। उनके अनुसार, विदेश नीति केवल नैतिक भाषणबाजी का मंच नहीं है, बल्कि यह सिद्धांतों और शक्ति के बीच संतुलन साधने का क्षेत्र है। थरूर ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि भारत ने अतीत में भी कई बार राष्ट्रीय हितों के चलते चुप्पी साधी है, जैसे 1956 में हंगरी या 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के दौरान। उन्होंने खाड़ी क्षेत्र की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि वहां 90 लाख भारतीय कार्यरत हैं और हमारा 200 अरब डॉलर का व्यापार उसी क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में किसी एक पक्ष के खिलाफ कड़ा सार्वजनिक रुख अपनाना भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकता है। सांसद थरूर ने यह भी रेखांकित किया कि मौजूदा वैश्विक हालातों और अमेरिका के साथ रक्षा व तकनीकी साझेदारी को देखते हुए भारत का संयम ही उसकी असली ताकत है। उन्होंने कहा कि चुप्पी का मतलब युद्ध का समर्थन करना नहीं, बल्कि अनावश्यक टकराव से बचते हुए कूटनीतिक संवाद के रास्ते खुले रखना है। वीरेंद्र/ईएमएस/19मार्च2026