पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दिया है और इसका सबसे बड़ा असर भारत के शेयर बाजार पर देखने को मिला। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष ने निवेशकों के भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है। एक ही कारोबारी दिन में निवेशकों के लगभग बारह लाख करोड़ रुपये डूब गए, जो यह दर्शाता है कि वैश्विक घटनाएं किस तरह घरेलू बाजार को प्रभावित करती हैं। यह गिरावट केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने निवेशकों के मन में डर और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया। भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स में करीब पच्चीस सौ अंकों की भारी गिरावट दर्ज की गई और यह गिरकर लगभग चौहत्तर हजार के स्तर पर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी में भी सात सौ से अधिक अंकों की गिरावट आई। यह गिरावट पिछले कई महीनों में सबसे बड़ी मानी जा रही है। बाजार के लगभग सभी क्षेत्रों में बिकवाली का दबाव दिखाई दिया, जिससे यह साफ हो गया कि यह केवल किसी एक सेक्टर की समस्या नहीं बल्कि व्यापक आर्थिक चिंता का परिणाम है। इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण युद्ध का तेल और गैस क्षेत्रों तक पहुंचना है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया के ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख केंद्र है और जब यहां अस्थिरता बढ़ती है तो उसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। युद्ध के चलते कई महत्वपूर्ण ऊर्जा ठिकानों पर हमले हुए, जिससे उत्पादन और आपूर्ति दोनों प्रभावित हुए। इसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया और यह एक समय एक सौ पंद्रह डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल बाजार तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह आम लोगों की जिंदगी पर भी असर डालता है। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में वृद्धि होती है। यही कारण है कि इस संघर्ष ने महंगाई की आशंका को भी बढ़ा दिया है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने बाजार की स्थिति को और कमजोर कर दिया। घरेलू कारणों ने भी इस गिरावट को और गहरा किया। बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के प्रमुख शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली, जिससे पूरे बाजार पर दबाव बना। निवेशकों ने जोखिम से बचने के लिए तेजी से अपने निवेश को निकालना शुरू कर दिया, जिससे बाजार में घबराहट और बढ़ गई। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी लगभग तीन प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई, जो यह दिखाता है कि छोटे निवेशकों पर इसका प्रभाव अधिक पड़ा। हालांकि इस भारी गिरावट के बाद अगले ही दिन बाजार में कुछ सुधार भी देखने को मिला। निवेशकों ने निचले स्तर पर खरीदारी की, जिससे बाजार में थोड़ी स्थिरता आई। तेल की कीमतों में हल्की गिरावट भी इस सुधार का एक कारण रही। इससे यह संकेत मिलता है कि बाजार में अभी भी उम्मीद बाकी है, लेकिन स्थिति पूरी तरह स्थिर नहीं कही जा सकती। इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहा बल्कि सोना और चांदी जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों पर भी पड़ा। आमतौर पर संकट के समय इनकी कीमतें बढ़ती हैं, लेकिन इस बार कीमतों में गिरावट देखने को मिली। इसका कारण यह है कि निवेशकों ने नकदी बनाए रखने के लिए इन धातुओं में भी बिकवाली की। ऊर्जा संकट के चलते पेट्रोल की कीमतों पर भी असर पड़ा है। प्रीमियम पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए हैं, जिससे उन लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है जो उच्च गुणवत्ता वाले ईंधन का उपयोग करते हैं। हालांकि सामान्य पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अभी कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन यदि कच्चे तेल की कीमतंे इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं तो भविष्य में आम ईंधन भी महंगा हो सकता है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। युद्ध अब केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा बल्कि आर्थिक ढांचे को निशाना बना रहा है। ऊर्जा संसाधनों पर हमले यह दर्शाते हैं कि दोनों पक्ष एक दूसरे को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी असर पड़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं। रुपये की कमजोरी भी इस संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू है। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से आयात महंगा हो जाता है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यह स्थिति निवेशकों के लिए और अधिक चिंता का कारण बनती है क्योंकि इससे बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारतीय शेयर बाजार में आई भारी गिरावट इसी का एक उदाहरण है। आने वाले समय में बाजार की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि यह संघर्ष किस दिशा में आगे बढ़ता है और कच्चे तेल की कीमतें किस स्तर पर स्थिर होती हैं। यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं होती है तो इसका असर लंबे समय तक बना रह सकता है। ऐसे में निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है और बाजार की चाल को समझकर ही निर्णय लेना होगा। यह संकट एक बार फिर यह सिखाता है कि वैश्विक घटनाएं किस तरह हमारे आर्थिक जीवन को प्रभावित करती हैं और हमें हमेशा बदलती परिस्थितियों के लिए तैयार रहना चाहिए। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 23 मार्च 26