-रुपया बचाएं या विदेशी मुद्रा भारतीय रिजर्व बैंक इन दिनों गहरे संकट में फंस गया है। रिजर्व बैंक यदि रुपए को बचाने की कोशिश करता है तो ऐसी स्थिति में वह खाई में गिरने की स्थिति में आता है, विदेशी मुद्रा के भंडार को यदि वह रुपए के बचाने में उपयोग करता है तो गहरे कुएं में गिरना तय है। रिजर्व बैंक को समझ नहीं आ रहा है कि वह किस तरह से स्थिति को संभाले। इजरायल-अमेरिका और ईरान के युद्ध ने भारतीय रिजर्व बैंक को बड़ी मुसीबत में डाल दिया है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत 94 रुपए के स्तर पर पहुंच गई है। कारोबारी उद्योग जगत तथा कच्चे तेल, गैस इत्यादि के आयात के लिए विदेशी मुद्रा की सबसे बड़ी आवश्यक्ता देश को है। रुपए को गिरने से रोकने के लिए पहले भी रिजर्व बैंक ने बहुत सारी विदेशी मुद्रा खर्च कर दी है। वर्तमान अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी मुद्रा भंडार भरा होना जरूरी है, लेकिन रिजर्व बैंक में इसकी स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। डॉलर की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। कच्चे तेल और गैस आयात को लेकर भी अतिरिक्त डॉलर की मांग बनी है। पहले रूस से जो कच्चा तेल और गैस आती थी उसका भुगतान डॉलर में नहीं होता था, लेकिन अब डॉलर के ऊपर सभी ओर से दबाव बढ़ता चला जा रहा है। जिसके कारण रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए चुनौतियां बढ़ती चली जा रही हैं। सरकार का दबाव डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत को गिरने से रोकना है। पिछले कई महीने से रिजर्व बैंक डॉलर और विदेशी मुद्रा भंडार के जरिए रुपए की गिरावट को रोक रहा था, लेकिन अब विदेशी मुद्रा भंडार इस स्थिति में आकर खड़ा हो गया है कि अब रिजर्व बैंक ने पर्याप्त मात्रा में विदेशी भंडार और डॉलर को नहीं रखा तो स्थिति और भी खराब हो जाएगी। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगले कुछ महीने में डॉलर के मुकाबले रुपया 100 रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था को काफी बड़ा नुकसान होगा। कच्चे तेल और गैस का 60 फ़ीसदी से अधिक आयात इन दिनों डॉलर मुद्रा में हो रहा है। ईरान और रूस ने भी भारत को कच्चा तेल और गैस देना स्वीकार कर लिया है, लेकिन इसका भुगतान विदेशी मुद्रा में प्राप्त करने की शर्त लगा दी है। ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक को डॉलर और युआन का पर्याप्त भंडार बनाकर रखना होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो 1990 में जिस तरह से चंद्रशेखर सरकार को सोना गिरवी रखकर कच्चे तेल का आयात करना पड़ा था, वही स्थिति भविष्य में निर्मित हो सकती है। रिजर्व बैंक के आंकड़े बता रहे हैं की 13 मार्च तक उसके पास 710 अरब डॉलर का भंडार था, मार्च माह में विदेशी निवेशकों ने 12.01 अरब डॉलर जो भारतीय मुद्रा में लगभग 1.10 लाख करोड रुपए होता है वह निकाल लिया है। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा सोना, एसडीआर और आईएमएफ के जरिए प्राप्त होती है। विदेशी मुद्रा का भंडार अमेरिकी डॉलर यूरो, युआन और पाउंड पर निर्भर करता है। भारतीय रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार में 556 अरब डॉलर और 131 अरब डॉलर का सोना है। आरबीआई सोने को बेचता नहीं है, इस स्थिति में रिजर्व बैंक के पास डॉलर के मुकाबले रुपए में आ रही गिरावट को रोकने के लिए मात्र दो तरीके बचते हैं, पहला वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार की मुद्राओं को बाजार में बेचे लेकिन इसका असर भारत की आर्थिक स्थिति पर पड़ेगा। दूसरा ब्याज दरों को बढ़ाना पड़ेगा। इससे रुपए की गिरावट कुछ समय के लिए थम सकती है। लेकिन जिस तरह की स्थिति बनी हुई है विदेशी मुद्रा के रूप में विदेश से जो राशि रिजर्व बैंक में आती थी उसमें बड़ी गिरावट आई है। युद्ध के कारण जिस तरह की स्थिति है उसके बाद उसको थाम पाना रिजर्व बैंक के लिए आसान नहीं रहा। डोनाल्ड ट्रंप जब अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तब भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 84 रुपए का था जो अब 94 रुपए के स्तर पर पहुंच गया है। पिछले 1 वर्ष में जिस तरह से अमेरिका ने भारत के ऊपर रुस से तेल और कच्चा तेल और गैस लेने पर प्रतिबंध लगाया था उसके बाद से भारत को सारा कच्चा तेल और गैस एवं अन्य सामग्री डॉलर में खरीदनी पड़ रही है, जिसके कारण विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति इन दिनों सबसे ज्यादा खराब है। रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय में आर्थिक विशेषज्ञों की कमी इस समस्या को और भी बढ़ा रही है। रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तथा अन्य लोग जिस तरह के निर्णय ले रहे हैं, इसका असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था में पढ़ता हुआ दिख रहा है। रिजर्व बैंक में जो आर्थिक विशेषज्ञ हैं उनका मानना है कि यदि यही प्रवाह बना रहा तो 4 से 6 महीने के अंदर 1991 वाली स्थिति विदेशी मुद्रा को लेकर फिर आ सकती है, जिसके कारण भारत का अर्थ संकट बड़ी तेजी के साथ बढ़ेगा। ईएमएस / 27 मार्च 26