लेख
29-Mar-2026
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देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित हरित और सांस्कृतिक आभा से परिपूर्ण परिसर सुंदर नर्सरी में आयोजित भारत ट्राइब्स फेस्ट 2026 ने इस वर्ष जिस प्रकार जनसामान्य, नीति-निर्माताओं, उद्यमियों और सांस्कृतिक प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया,वह अपने आप में एक ऐतिहासिक संकेत है—भारत की जनजातीय परंपराओं के पुनर्जागरण और उनके आर्थिक सशक्तिकरण का।जनता के अभूतपूर्व उत्साह और मांग को देखते हुए जनजातीय मामलों का मंत्रालय ने ट्राइफेड के सहयोग से इस महोत्सव को 5 अप्रैल 2026 तक बढ़ाने का निर्णय लिया। यह विस्तार केवल तिथि का विस्तार नहीं, बल्कि एक व्यापक दृष्टि का प्रतीक है—जनजातीय समाज को बाजार,सम्मान और अवसरों से जोड़ने की प्रतिबद्धता का।सरकार के इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की जनजातीय विरासत अब केवल संग्रहालयों या पुस्तकों तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि वह देश की आर्थिक और सांस्कृतिक धारा में सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। महोत्सव में उमड़ी भीड़, प्रदर्शनी स्टॉलों पर लगी कतारें, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों पर गूँजती तालियाँ और आदिवासी व्यंजनों का स्वाद लेते लोग - यह सब मिलकर एक जीवंत भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। महोत्सव का विस्तार विशेष रूप से आदिवासी कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और वन धन विकास केंद्रों के लिए नई संभावनाएं लेकर आया है। इस विस्तारित अवधि में उन्हें उपभोक्ताओं से सीधे संवाद का अवसर मिलेगा,जिससे न केवल उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ेगी, बल्कि उनकी कला और परंपरा को व्यापक पहचान भी मिलेगी। बाजार तक सीधी पहुँच, बेहतर मूल्य और स्थायी आय—ये तीनों पहलू इस आयोजन के केंद्र में हैं।इस वर्ष के आयोजन में 22राज्यों के78 आदिवासी समुदायों की सह भागिता,28 राज्यों के 300 से अधिक कला एवं शिल्प प्रदर्शकों की उपस्थिति और 21 राज्यों से आए 120 आदिवासी व्यंजन विशेषज्ञों द्वारा संचालित 30 फूड स्टॉल—यह आंकड़े केवल संख्या नहीं,बल्कि भारत की विविधता और एकता का सशक्त प्रतीक हैं। यहां हस्तशिल्प,हथकरघा, प्राकृतिक उत्पाद, जैविक वस्तुएं और पारंपरिक ज्ञान का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। महोत्सव का एक महत्वपूर्ण आकर्षण 29 मार्च को आयोजित वन धन कॉन्क्लेव रहा,जिसका उद्घाटन जनजातीय मामलों के केन्द्रीय राज्य मंत्री दुर्गादास उइके द्वारा विशिष्ट गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में किया गया।इस कॉन्क्लेव ने जनजातीय उद्यमिता को नई दिशा देने का कार्य किया। अपने उद्घाटन संबोधन में मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “जनजातीय समुदाय केवल संरक्षण के पात्र नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के सक्रिय भागीदार हैं।उनके पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के प्रति उनकी समझ और उनकी जीवन शैली आज के सतत विकास के मॉडल को दिशा दे सकती है।”मंत्री ने आगे कहा कि सरकार की प्राथमिकता जनजातीय समाज को आत्मनिर्भर बनाना है, न कि केवल सहायता पर निर्भर रखना। उन्होंने लघु वन उपज के मूल्यवर्धन,स्थानीय उत्पादों के ब्रांडिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बाजार विस्तार पर विशेष बल दिया।उनके अनुसार,“जब एक आदिवासी कारीगर का उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुँचता है, तो वह केवल एक वस्तु का लेन-देन नहीं होता,बल्कि वह विश्वास, परंपरा और संस्कृति का आदान-प्रदान होता है।” कॉन्क्लेव के अंतर्गत पाँच विषयगत सत्र आयोजित किए गए,जिनमें सतत आजीविका,लघु वन उपज का मूल्य संवर्धन,बाजार संपर्क, कौशल विकास और जनजातीय उद्यमशीलता को सुदृढ़ करने जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई। विशेषज्ञों,नीति निर्माताओं और उद्यमियों ने मिलकर यह विचार किया कि किस प्रकार जनजातीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है। महोत्सव के दौरान आयोजित भारत ट्राइब्स बिजनेस कॉन्क्लेव और सीएसआर कॉन्क्लेव ने भी साझेदारी और निवेश के नए अवसरों को जन्म दिया।कॉर्पोरेट जगत और जनजातीय उद्यमों के बीच संवाद ने यह स्पष्ट किया कि यदि सही दिशा और सहयोग मिले,तो जनजातीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकते हैं।इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल आर्थिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है,बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है।यहाँ प्रस्तुत होने वाले लोक नृत्य,संगीत, पारंपरिक वेशभूषा और जीवन शैली भारत की उस आत्मा को सामने लाते हैं, जो प्रकृति के साथ संतुलन में जीने की कला सिखाती है।सरकार द्वारा संचालित वन धन योजना के माध्यम से देशभर में स्थापित वन धन विकास केंद्रों ने जनजातीय समुदायों के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया है। ये केंद्र स्थानीय संसाधनों के प्रसंस्करण और विपणन में सहायता करते हैं, जिससे कारीगरों की आय में वृद्धि होती है।महोत्सव में इन केंद्रों की सक्रिय भागीदारी इस योजना की सफलता का प्रमाण है।केंद्रीय राज्यमंत्री दुर्गादास उइके ने अपने संबोधन में यह भी उल्लेख किया कि सरकार पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।उन्होंने कहा कि “जनजातीय समाज की जीवन शैली में वह ज्ञान निहित है,जो पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।हमें इस ज्ञान को संरक्षित करते हुए उसे आधुनिक संदर्भों में उपयोग करना होगा।”इस महोत्सव में आए आगंतुकों के लिए यह एक अनूठा अनुभव रहा। जहां एक ओर वे देश के विभिन्न हिस्सों से आए उत्पादों को देख और खरीद सके, वहीं दूसरी ओर उन्हें जनजातीय संस्कृति को करीब से समझने का अवसर मिला।बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक,सभी वर्गों के लोगों ने इस आयोजन में उत्साह पूर्वक भाग लिया।इस विस्तारित अवधि ने विशेष रूप से उन कारीगरों को लाभ पहुंचाया है,जो दूरदराज के क्षेत्रों से यहां पहुंचे हैं।उनके लिए यह केवल एक व्यापारिक अवसर नहीं,बल्कि अपने अस्तित्व और पहचान को स्थापित करने का मंच है।कई कारीगरों ने यह साझा किया कि इस महोत्सव ने उन्हें न केवल आर्थिक लाभ दिया है,बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ाया है। भारत ट्राइब्स फेस्ट 2026 का यह विस्तार एक व्यापक संदेश देता है—विकास तभी सार्थक है,जब वह समावेशी हो।जब समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक अवसर पहुंचे, तभी वास्तविक प्रगति संभव है। जनजातीय समुदाय,जो सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीवन जीते आए हैं,आज आधुनिक भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत ट्राइब्स फेस्ट 2026 केवल एक महोत्सव नहीं, बल्कि एक आंदोलन है - आत्मनिर्भर भारत की दिशा में, सांस्कृतिक गौरव के पुनर्स्थापन की दिशा में और जनजातीय समाज के सशक्तिकरण की दिशा में।इसका विस्तार इस बात का प्रमाण है कि देश अब अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए, उन्हें आधुनिकता के साथ जोड़कर आगे बढ़ने के लिए तैयार है।आयोजकों द्वारा इस अवशर आगंतुकों से आह्वान किया गया है कि वे इस विस्तारित अवसर का अधिकतम लाभ उठाएँ और इस महोत्सव में आकर न केवल खरीदारी करें,बल्कि उस भारत को महसूस करें,जो अपनी विविधता में एकता का सजीव उदाहरण है - एक ऐसा भारत,जहाँ परंपरा और प्रगति साथ-साथ चलती हैं। ( स्वतंत्र पत्रकार व स्तम्भकार) ईएमएस / 29 मार्च 26