लेख
11-Apr-2026
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12 अप्रैल अंतर्राष्ट्रीय सड़क बाल दिवस) शहरों की चकाचौंध भरी सड़कों पर दौड़ती गाड़ियाँ और काँच की ऊँची इमारतों से झाँकती कृत्रिम रोशनी विकास का बड़ा दावा करती हैं। लेकिन इसी चमक-धमक के बीच, ट्रैफिक सिग्नल की लाल बत्ती पर कुछ नन्हे हाथ आपकी कार के शीशे थपथपाते हैं। कोई हाथ में रंगीन गुब्बारे लिए खड़ा है, तो कोई महज़ चंद रुपयों के लिए पेन या रुमाल आपकी ओर बढ़ा देता है। आज 12 अप्रैल है—अंतर्राष्ट्रीय स्ट्रीट चिल्ड्रेन डे। यह दिन दुनिया भर में उन बच्चों के नाम समर्पित है, जिनका घर कोई चारदीवारी नहीं बल्कि तपती सड़कें और असुरक्षित फुटपाथ हैं। सवाल यह है कि क्या हम इन बच्चों को वाकई देख पा रहे हैं, या इन्हें सड़क के शोर का एक हिस्सा समझकर हर रोज़ नज़रअंदाज़ कर रहे हैं?सड़क पर रहने वाले इन बच्चों के लिए आसमान ही छत है और कंक्रीट का फुटपाथ ही बिछौना। इनके हिस्से में बचपन के खिलौने नहीं, बल्कि वह उत्तरदायित्व है जिसे उठाने की उम्र अभी इनकी हुई भी नहीं। एक तरफ जहाँ हम डिजिटल इंडिया और विश्व गुरु बनने का संकल्प दोहराते हैं, वहीं दूसरी ओर देश के हज़ारों बच्चे कूड़ा बीनने या भीख माँगने को विवश हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें बताती हैं कि दुनिया भर में लगभग 15 करोड़ बच्चे सड़कों पर अपना जीवन गुजार रहे हैं। भारत के संदर्भ में यह आंकड़ा और भी डराने वाला है। सेव द चिल्ड्रन के एक सर्वे के अनुसार, अकेले भारत के बड़े शहरों में करीब 20 लाख से अधिक बच्चे ऐसे हैं जिनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। ये वे बच्चे हैं जो जनगणना के पन्नों से भी अक्सर गायब रह जाते हैं। इन बच्चों की दुनिया अभावों और असुरक्षा से भरी है। इनमें से 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और लगभग 40 प्रतिशत बच्चों को कभी स्कूल जाने का सौभाग्य ही नहीं मिला। शिक्षा का अधिकार कानून कागजों पर तो बहुत मज़बूत दिखता है, लेकिन इन बच्चों के लिए स्कूल की घंटी से कहीं ज़्यादा अहमियत ट्रैफिक सिग्नल की लाल बत्ती रखती है। उनके लिए पेट की भूख, अक्षरों की भूख से कहीं बड़ी और तात्कालिक है। विडंबना देखिए, जिस उम्र में उन्हें स्कूल के बस्ते का बोझ उठाना चाहिए था, उस उम्र में वे पूरे परिवार की उम्मीदों का बोझ अपने कोमल कंधों पर ढो रहे हैं। समस्या केवल आर्थिक तंगी की नहीं है, बल्कि उस सामाजिक उदासीनता की भी है जो इन्हें अपराधी या नशेड़ी मानकर हाशिए पर धकेल देती है। सड़कों पर रहने के कारण ये बच्चे शारीरिक शोषण और मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले गिरोहों के आसान निशाने पर होते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि लापता होने वाले बच्चों में एक बड़ी संख्या इन्हीं स्ट्रीट चिल्ड्रेन की होती है, जिनका कोई रिकॉर्ड न होने के कारण उन्हें खोजना लगभग नामुमकिन हो जाता है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल संवेदना प्रकट कर देने से इनका भाग्य बदल जाएगा? समाधान के लिए हमें बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। सबसे पहले सरकार को मल्टी-एजेंसी मॉडल पर काम करना होगा, जहाँ पुलिस, बाल कल्याण समितियाँ और नगर निगम मिलकर इन बच्चों का डेटा तैयार करें। केवल आधार कार्ड न होने की वजह से इन्हें सरकारी योजनाओं से वंचित रखना इनके मानवाधिकारों का हनन है। इनके लिए मोबाइल स्कूलों की व्यवस्था करनी होगी, जो वहीं पहुँचें जहाँ ये बच्चे रहते हैं। कौशल विकास के छोटे-छोटे केंद्र शुरू किए जाने चाहिए ताकि ये बच्चे भीख माँगने के बजाय हुनर सीख सकें। समाज के तौर पर हमारी भी एक नैतिक जवाबदेही है। हम अक्सर इन्हें देखकर अपनी गाड़ी का शीशा चढ़ा लेते हैं या कुछ सिक्के फेंक कर अपना फर्ज़ पूरा समझ लेते हैं। लेकिन इन्हें सिक्कों की नहीं, सम्मान और संभावना की ज़रूरत है। हमें भिक्षा नहीं, शिक्षा के मंत्र को आत्मसात करना होगा। पैसे देने के बजाय हम उनके लिए पास के किसी सरकारी स्कूल में दाखिले की प्रक्रिया शुरू करवा सकते हैं या उन्हें भोजन और कपड़े उपलब्ध कराने वाली भरोसेमंद संस्थाओं से जुड़ सकते हैं। स्थानीय स्तर पर मोहल्ला समितियों को इन बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा उठाना होगा ताकि वे किसी असामाजिक गिरोह के हत्थे न चढ़ें। बदलाव की शुरुआत हमारी सोच से होगी। जब तक हम इन्हें समस्या समझेंगे, समाधान नहीं निकलेगा; जिस दिन हम इन्हें देश की संपत्ति समझना शुरू करेंगे, राहें खुद-ब-खुद निकल आएंगी। अगर किसी राष्ट्र का बचपन फुटपाथ पर असुरक्षित होकर दम तोड़ रहा है, तो उस राष्ट्र का भविष्य कभी पूरी तरह उज्ज्वल नहीं हो सकता। हर बच्चा, चाहे वह आलीशान बंगले में हो या धूल भरे चौराहे पर, एक गरिमामयी जीवन और सुरक्षित भविष्य का समान हकदार है। आइए, इस वर्ष इन बच्चों की आँखों में उम्मीद का एक वास्तविक दीया जलाएँ और उन्हें सड़क के सन्नाटे से निकालकर स्कूल की चहल-पहल तक पहुँचाने का संकल्प लें। (लेखक पत्रकार हैं) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 12 अप्रैल /2026