लेख
15-Apr-2026
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आज का युग विज्ञान का युग है जहाँ प्रत्येक तथ्य को प्रयोग और परिणाम के आधार पर परखा जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमें तर्क करना सिखाता है, परन्तु यह भी सत्य है कि विज्ञान के सिद्धान्त समय के साथ बदलते रहते हैं। जो आज सत्य प्रतीत होता है, वह कल असत्य सिद्ध हो सकता है। किन्तु एक ऐसा तत्व है जो कभी नहीं बदलता और वह है सत्य। सत्य त्रिकाल में अटल रहता है। वह न तो परिस्थितियों से प्रभावित होता है और न ही समय के प्रवाह से। अग्नि का स्वभाव ऊष्मा देना है, यह सत्य है और यह सदैव रहेगा। अग्नि जलाती है, परन्तु वह सब कुछ नहीं जला सकती। उसी प्रकार संसार की कोई भी शक्ति आत्मा को प्रभावित नहीं कर सकती। आत्मा का स्वरूप भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं और न अग्नि जला सकती है। आत्मा निराकार, निरंजन और चैतन्यमय है। वह अजर-अमर है और उसका अस्तित्व शरीर से स्वतंत्र है। जब मनुष्य इस सत्य को स्वीकार करता है, तब उसके जीवन में आस्था और स्थिरता का जन्म होता है। मानव जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य स्वयं को जानना है। हम बाहरी संसार में इतना उलझ जाते हैं कि अपने भीतर झांकने का समय ही नहीं निकाल पाते। जबकि हमारे भीतर ही वह दिव्य प्रकाश विद्यमान है जो हमें सत्य का बोध करा सकता है। यह शरीर एक भव्य महल के समान है और आत्मा उसमें जलने वाला दीपक है। जब यह दीपक प्रज्वलित होता है, तब जीवन के सभी अंधकार दूर हो जाते हैं। अध्यात्म का मार्ग इसी आत्मबोध की ओर ले जाता है। यह मार्ग सरल नहीं है, परन्तु अत्यंत फलदायी है। जैसे सोना अग्नि में तपकर शुद्ध हो जाता है, वैसे ही आत्मा भी साधना के द्वारा शुद्ध होती है। जब मनुष्य अध्यात्म की ओर अग्रसर होता है, तब उसकी आसक्ति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। वह समझने लगता है कि संसार की सभी वस्तुएँ नश्वर हैं और उनसे मोह करना दुख का कारण है। आसक्ति ही सभी दुखों की जड़ है और उससे मुक्त होकर ही सच्चा सुख प्राप्त किया जा सकता है। सत्य को जानना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे जीवन में उतारना आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति सत्य को समझ सकता है, परन्तु उसे स्वीकार करना और उसके अनुसार आचरण करना कठिन होता है। यही कारण है कि सत्य का मार्ग कठिन माना गया है। परन्तु जो व्यक्ति इस मार्ग पर चलता है, वही अंततः सफल होता है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ सत्य के बल पर असंभव को संभव बनाया गया है। सत्य हमारे भीतर ही विद्यमान है, परन्तु अज्ञान के कारण हम उसे पहचान नहीं पाते। हमारे मन में अनेक प्रकार के भ्रम और विकार होते हैं, जो सत्य के प्रकाश को ढक देते हैं। जब हम अपने मन को शुद्ध करते हैं और आत्मचिंतन करते हैं, तब धीरे-धीरे ये पर्दे हटने लगते हैं और सत्य का प्रकाश प्रकट होता है। यही आत्मजागरण है, जो मनुष्य को वास्तविक ज्ञान की ओर ले जाता है। दुनिया में अनेक प्रकार के सौन्दर्य हैं। कोई प्रकृति में सौन्दर्य देखता है, कोई वस्तुओं में और कोई शरीर में। परन्तु इन सभी का अनुभव करने वाला तत्व आत्मा ही है। इसलिए वास्तविक सौन्दर्य आत्मा में ही निहित है। बाहरी सौन्दर्य क्षणिक होता है, जबकि आत्मा का सौन्दर्य शाश्वत होता है। जब मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है, तब उसकी दृष्टि बदल जाती है और वह बाहरी आकर्षणों से प्रभावित नहीं होता। यदि हम यह मानते हैं कि सभी जीव एक ही परम सत्ता की संतान हैं, तो हमें उनके प्रति करुणा और सम्मान का भाव रखना चाहिए। किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना, उस परम सत्य के विरुद्ध जाना है। मानवता का वास्तविक अर्थ यही है कि हम सभी प्राणियों के प्रति सहानुभूति रखें और उनके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें। यही भावना हमें सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाती है। मनुष्य की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपनी गलतियों का दोष दूसरों पर डाल देता है। वह स्वयं को सुधारने के बजाय दूसरों को दोषी ठहराता है। जबकि वास्तविक आवश्यकता आत्मनिरीक्षण की है। जब हम अपनी कमियों को पहचानते हैं और उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं, तभी हमारा विकास होता है। सजगता ही आत्मोन्नति का पहला कदम है। आज के समय में विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है, परन्तु इसके साथ-साथ नैतिक मूल्यों में गिरावट भी आई है। मनुष्य भौतिक सुखों के पीछे इतना भाग रहा है कि वह अपने आध्यात्मिक विकास को भूल गया है। प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ ने समाज में अशांति और हिंसा को बढ़ावा दिया है। बच्चों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। वे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। यदि उन्हें सही मार्गदर्शन न मिले, तो वे गलत दिशा में जा सकते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम नई पीढ़ी को सत्य और अध्यात्म का महत्व समझाएँ। उन्हें यह सिखाएँ कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सफलता नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति भी है। जब समाज में सत्य और नैतिकता का प्रचार होगा, तभी शांति और संतुलन स्थापित होगा। अंततः यह कहा जा सकता है कि आत्मा का सौन्दर्य ही वास्तविक सौन्दर्य है और सत्य उसका प्रकाश है। जो व्यक्ति सत्य को जान लेता है और उसे अपने जीवन में उतारता है, वही सच्चे अर्थों में सफल और सुखी होता है। विज्ञान और अध्यात्म दोनों का संतुलन आवश्यक है, परन्तु यदि हमें चुनना पड़े, तो सत्य और आत्मज्ञान को प्राथमिकता देनी चाहिए। यही जीवन का परम उद्देश्य है और यही मानवता का वास्तविक मार्ग है। ( L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 15 अप्रैल 26