लेख
17-Apr-2026
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भारत की राजनीति में वर्तमान समय में तूफान देखने को मिल रहा है। विपक्ष सरकार के ऊपर आक्रामक होता चला जा रहा है। वहीं सरकार विपक्ष पर आक्रामक होकर अपना बचाव करने और अपनी सत्ता को मजबूत बनाने के लिए जिस तेजी के साथ काम कर रही है उसने भारतीय राजनीति में एक नया तूफान ला दिया है। इसी बीच सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाया है। संसद के इस विशेष सत्र में सरकार महिला आरक्षण के पीछे छिपकर 2029 के लोकसभा चुनाव का बड़ा खेल करना चाहती है। जिस तरह से सरकार की चुनौतियां बढ़ रही हैं, उसको देखते हुए सरकार के लिए जरूरी हो गया था कि वह महिला आरक्षण को लेकर जनगणना के पहले ही परिसीमन के माध्यम से सीटें बढ़ा ले। परिसीमन आयोग में अपने लोगों की नियुक्ति करके 2029 के लोकसभा चुनाव के पहले महिला आरक्षण निश्चित कर दे। सरकार ने इसके लिए भी ऐसा समय चुना जबकि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में महिला आरक्षण की दुधारी तलवार चलाना सवाल खड़े कर रही है। सरकार का मानना है, कि इससे तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में फायदा होगा। जब राजनीतिक दल और उनके सांसद चुनाव प्रचार में फंसे होंगे उसी बीच विशेष सत्र बुलाकर संसद से बिल पास कराकर 2029 के लोकसभा चुनाव का चक्रव्यूह तैयार कर लेंगे। परिसीमन का मुद्दा विशेष रुप से संवेदनशील है, क्योंकि परिसीमन आयोग सरकार बनाएगी। ठीक उसी तरह जिस तरह से चुनाव आयोग सरकार के इशारे पर काम कर रहा है, विपक्ष की यह आशंका है। यदि सरकार ने परिसीमन आयोग बना लिया, उसमें 2026 में जो जनगणना हो रही है उसको बिल में स्थान नहीं दिया, ऐसी स्थिति में सरकार हिंदी भाषी राज्यों की जहां भाजपा का प्रभाव है वहां अपनी सीटों को बढ़ा लेगी। सरकार यदि यह बिल पास कराने में सफल हो गई तो 2047 तक फिर उसके लिए कोई चुनौती नहीं रह जाएगी। इस बात को विपक्ष और दक्षिण के राज्य अच्छी तरह से समझ रहे हैं। 2023 में जब यह महिला आरक्षण बिल पास हुआ था उस समय विपक्ष ने महिला आरक्षण तुरंत लागू करने सरकार पर दबाव बनाया था। उस समय सरकार ने जनगणना और उसके बाद परिसीमन की बात कहकर आरक्षण को 2029 तक के लिए टाल दिया था। 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं रहे। उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला उसके बाद से सरकार के लिए लगातार चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। भारत में राजनीतिक स्थितियों में बदलाव आया है। उसके बाद भाजपा को लग रहा है कि वह जल्द ही परिसीमन आयोग का गठन करके आयोग पर दबाव बनाकर महिला आरक्षण के बहाने जहां डबल इंजन की सरकारें हैं वहां पर लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन इस तरह से कराई जाए ताकि विपक्ष भविष्य में फिर कभी चुनौती न दे सके। जाति जनगणना को इस बिल में कोई महत्व नहीं दिया जा रहा है। ऐसी स्थिति में जो 33 प्रतिशत महिला आरक्षण है, उसमें भी अल्पसंख्यक समुदाय को दरकिनार करते हुए सामान्य वर्ग की महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा संख्या में लाकर सत्ता पर 2047 तक उन्हें फिर कोई चुनौती न मिले इसका इंतजाम मोदी सरकार करना चाह रही है। इसमें कितनी सफल होगी या नहीं होगी फिलहाल कहना मुश्किल है, लेकिन इसे लेकर जिस तरह से राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है उससे ऐसा लगता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में अब आर-पार की लड़ाई शुरू हो गई है। हद तो यह है कि राजनीतिक उथल-पुथल के बीच संसद के विशेष सत्र में लाए गए बिल के परिणाम क्या हो सकते हैं इसको लेकर कोई भी राजनीतिक पंडित स्पष्ट राय कायम नहीं कर पा रहा है। यह स्पष्ट है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य केवल विधेयकों या नीतियों का नहीं, बल्कि भरोसे और संतुलन का भी प्रश्न है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष इस टकराव को लोकतांत्रिक संवाद में बदल पाते हैं या नहीं। क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती टकराव में नहीं, बल्कि सहमति और संतुलन में निहित होती है। संसद का विशेष सत्र गुरुवार को शुरू हो गया है महिला आरक्षण विधेयक परिसीमन और जाति जनगणना को लेकर क्या फैसला होता है इसका पता लग जाएगा। जो सोचते हैं वह होता नहीं है और जो नहीं सोचते हैं अक्सर वही हो जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने जो रणनीति बनाई थी वह सफल नहीं हो पाई, अभी जो रणनीति बनाई है वह सफल हो पाएगी या नहीं इसको लेकर तरह-तरह की अटकलों का दौर शुरू हो गया है। ईएमएस / 17 अप्रैल 26