कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिन्हें शब्दों में बाँधना संभव नहीं होता। वे केवल व्यक्ति नहीं होते, बल्कि विचार, आदर्श और प्रेरणा के जीवंत प्रतीक होते हैं। डॉ श्रीगोपाल नारसन ऐसे ही एक विलक्षण, बहुआयामी और बेमिसाल व्यक्तित्व हैं।डॉ गोपाल नारसन, एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार से आते हैं इनके मामाश्री जगदीश प्रसाद वत्स चौदह अगस्त सन उन्नीस सौ बयालीस को हरिद्वार में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अंग्रेजों की गोली से शहीद हुए थे। उनकी कथा बड़ी ही दिलचस्प है शहीद जगदीश प्रसाद वत्स 17 वर्ष की आयु में ऋषिकुल विद्यापीठ आयुर्वेदिक कॉलेज हरिद्वार में बीएएमएस की पढ़ाई कर रहे थे,उस समय अंग्रेजों ने तिरंगा झंडा लहराने पर सख्त रोक लगा रखी थी। कुछ विद्यार्थियों के दलों के साथ जगदीश वत्स ने यह दृढ़ निष्चय किया कि चौदह अगस्त के दिन सन उन्नीस सौ बयालीस में पूरे हरिद्वार में तिरंगा झंडा वह ही फैहराएंगे, उन्होंने सुभाष घाट से तिरंगा हाथ में लेकर भारत माता की जय के नारे लगाते हुए आगे बढ़ने का निष्चय किया। अंग्रेजों की एक टोली ने उनको रोका, ललकारा, लेकिन वो नहीं रुके और देखते ही देखते उन्होंने तिरंगा फैहरा दिया,जिस पर उनको गोली मार दी गई ,पहली गोली लगने के बाद भी वो चलते रहे आगे डाकघर पर पहुंचे। डांकघर पर फिर उन्होंने तिरंगा फैहराया ,उनको अंग्रेजों ने फिर दूसरी गोली मार दी।लेकिन ये बहादुर युवक 2 गोली खाकर भी रुका नहीं पोल के सहारे रेलवे स्टेशन की छत्त पर चढ़ा और तिरंगा झंडा लहरा दिया रेलवे स्टेशन पर उनको तीसरी गोली मारी गई और फिर देहरादून मिल्ट्री अस्पताल में उनकी शहादत हुई। ऐसे अमर शहीद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जगदीश वत्स के प्रिय भांजे हैं डॉ श्रीगोपाल नारसन। इनका जीवन सादगी का एक पर्याय है। ईमानदारी कूट-कूटकर रग-रग में भरी हुई है, एक घटना इनके बारे में मुझे याद आती है वर्ष 2002 में उत्तराखंड में एनडी तिवारी के मुख्य मंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद कांग्रेस सरकार बनी थी, उस समय उनकी निष्ठा, ईमानदारी, कार्य क्षमता और कांग्रेस पार्टी के प्रति निष्ठा को देखते हुए डॉ श्री गोपाल नारसन को बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति का राज्य सदस्य मनोनीत किया गया था। श्रीगोपाल नारसन तब भी जनसामान्य के बीच जैसे पहले आते जाते थे,वैसे ही आते जाते रहे। सरकारी मीटिंगों के लिए भी सरकारी वाहन व गेस्ट हाऊस का उपयोग नही किया,न ही मिलने वाला मानदेय लिया। श्रीगोपाल नारसन ने कहा कि मैं अपने वकालत के पेशे से अपने परिवार का जीवकोपार्जन कर लेता हूँ , मिलने वाला मानदेय राशि नहीं चाहिए ,आज कितने ऐसे राजनेतिज्ञ हैं जो सरकार से मिलने वाले मानदेय व सुविधाओं को छोड़कर सादा जीवन जीते हुए देश की सेवा करते हैं। डॉ श्रीगोपाल नारसन कालांतर में हरीश रावत के नेतृत्व में जब उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनी तो वो तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के प्रवक्ता बने,साथ ही पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता भी मनोनीत किए गए, इस बार भी डॉ श्री गोपाल नारसन ने सरकारी सुविधाओं को लेने से इंकार कर दिया और अपना कार्य पार्टी के प्रति, देश के प्रति, समाज के प्रति पूरी निष्ठा के साथ करते रहे।स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार की गौरवशाली विरासत से आने वाले डॉ श्री गोपाल नारसन के जीवन में राष्ट्रनिष्ठा, सत्यनिष्ठा, सादगी और जनसेवा के संस्कार स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं। अमर शहीद जगदीश वत्स जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी के प्रिय भांजे होने के नाते उनके व्यक्तित्व में वही निर्भीकता, वही समर्पण और वही राष्ट्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।एक अधिवक्ता के रूप में डॉश्रीगोपाल नारसन की पहचान अत्यंत प्रतिष्ठित है। विशेष रूप से उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञ के रूप में वे व्यापक रूप से सम्मानित हैं। न्याय के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता, सिद्धांतों के प्रति निष्ठा और सत्य के पक्ष में अडिग रहने का साहस उन्हें विशिष्ट बनाता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान असाधारण है। वे डिवाइन मिरर हिंदी चैनल के संस्थापक हैं, जो प्रतिदिन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की महत्त्वपूर्ण खबरों को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य कर रहा है। इसके अतिरिक्त एक प्रख्यात पत्रकार के रूप में उनका नाम जुड़ा हुआ है। उनकी पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जनजागरण और सामाजिक चेतना का सशक्त अभियान है। साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। उनके द्वारा अब तक बाईस पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। इनमें “मीडिया को फांसी दो” और “श्रीमद्भगवद्गीता” विशेष रूप से चर्चित और प्रशंसित रही हैं। उनकी लेखनी में वैचारिक प्रखरता, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उनकी बहुआयामी प्रतिभा और समाजोपयोगी योगदान को विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सौ से अधिक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें डॉ. अंबेडकर नेशनल फेलोशिप सम्मान, मोटिवेशनल पर्सनैलिटी सम्मान, भारत गौरव सम्मान, प्रभाकर साहित्य कॉन्शियसनेस अवॉर्ड, तथा साहित्यिक अलंकरण सम्मान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।वास्तव में, सम्मान आपके पीछे-पीछे चलते हैं और वे उनके आगे-आगे। उनकी समाजसेवा, साहित्यसेवा, पत्रकारिता और जनसेवा निःसंदेह अनुकरणीय और प्रेरणास्पद है। आज जब सार्वजनिक जीवन में मूल्य, सिद्धांत और समर्पण दुर्लभ होते जा रहे हैं, ऐसे समय में डॉ श्री गोपाल नारसन जैसे व्यक्तित्व आशा, आदर्श और नैतिकता के प्रकाश-स्तंभ बनकर खड़े हैं। निस्संदेह कहा जा सकता है कि डॉ श्री गोपाल नारसन एक विलक्षण प्रतिभा के धनी, बेमिसाल शख्सियत हैं—ऐसी शख्सियत, जो आज के युग में विरल है।हमे उनपर नाज़ है। (लेखक प्रांतीय अध्यक्ष, संस्कृत भारती उत्तरांचल,कार्यकारी अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय हिंदी परिषद (पूर्व संस्कृत शिक्षा निदेशक, उत्तराखंड, पूर्व सचिव, उत्तराखंड संस्कृत अकादमी है) ईएमएस/19/03/2026