लेख
21-Apr-2026
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हिमाचल की सरकार का वित्तीय संकट तेजी के साथ बढ़ता जा रहा है। प्राकृतिक प्रकोप के कारण हिमाचल सरकार के ऊपर खर्च बढ़ा है। केंद्र सरकार से प्राकृतिक आपदा के लिए जो सहायता मिलनी चाहिए थी वह भी नहीं मिली। दरअसल प्राकृतिक आपदा के कारण प्रदेश को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, जिसके फलस्वरुप हिमाचल में अब खर्चे में कटौती करनी पड़ रही है। अर्थव्यवस्था बुरी तरह से डगमगा गई है। मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों के वेतन में कटौती की गई है। आगे चलकर इसका असर वेतन, पेंशन विकास कार्यों और जनहितकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पड़ना तय है। हिमाचल प्रदेश सरकार का बढ़ता कर्ज, सीमित राजस्व स्रोतों ने हिमाचल को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा दिया है। यह स्थिति हिमाचल तक सीमित नहीं है। देश के एक दर्जन से अधिक राज्य आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। हर माह उन्हें कर्ज लेना पड़ रहा है। पंजाब, राजस्थान, केरल, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का कर्ज बढ़ता ही जा रहा है। कई राज्यों का कुल ऋण उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद के 30 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया है। जो राज्यों की वित्तीय स्थिति के लिए खतरे की घंटी है। इन राज्यों की आय का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन, ब्याज, कर्ज की अदायगी और लोक लुभावन योजनाओं में खर्च हो रही है। जिसके कारण विकास योजनाओं के लिए सरकारी खजाने में राशि ही नहीं है। समस्या की जड़ में राजनीतिक लोकलुभावन नीतियां हैं। मुफ्त बिजली, सब्सिडी और नकद सहायता जैसी योजनाओं ने राज्य की आर्थिक स्थिति का कबाड़ा कर दिया है। जो आने वाले समय में राजकोषीय संतुलन को बिगाड़ रही हैं। सभी राज्य सरकारों को लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है। यही कर्ज धीरे-धीरे राज्यों के वित्तीय संकट के रूप मे सामने आ रहा है। अमेरिका- इजरायल और ईरान युद्ध के बाद भारत सरकार का बजट भी गड़बड़ा रहा है। भारत सरकार को ऊर्जा जरूरत और अन्य जरूरत का बजट लगातार बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार का राजस्व घट रहा है, इसका असर भी राज्यों की आर्थिक स्थिति में पड़ना तय है। महंगाई, बेरोजगारी और आयात का बढ़ता खर्च केंद्र सरकार के साथ-साथ वित्तीय संस्थाओं के ऊपर भी दिखने लगा है। शेयर मार्केट की गिरावट से वित्तीय संस्थानों में इसका असर दिखने लगा है। रिजर्व बैंक भी इससे अछूता नहीं है। युद्ध के कारण वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं, ब्याजदरों में वृद्धि, विदेशी मुद्रा संकट का असर केंद्र से मिलने वाले राजस्व में कटौती राज्यों की परेशानी बढ़ा रहा है। यदि यही स्थिति तीन-चार महीने और बनी रही, तो आने वाले महीनो में कई राज्य सरकारें कर्ज और खर्च के जाल में फंस सकती हैं। कई राज्य अभी भी नया कर्ज पुराने कर्ज को चुकाने के लिए लेने को विवश हो रहे हैं। राज्यों के ऊपर जिस तरह से आर्थिक संकट बढ़ता चला जा रहा है, इस संकट से निकलने के लिए राज्यों को कठोर आवश्यक कदम उठाने होंगे। राजस्व बढ़ाने आय और व्यय के बीच में संतुलन बनाते हुए कर सुधार, के साथ-साथ गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करना होगी। विकास योजनाओं की प्राथमिकता तय करनी होगी। सरकार को वित्तीय अनुशासन आय और व्यय के बीच में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करके वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करना होगा। समय रहते सुधार के प्रयास नहीं किए गए, तो यह संकट कुछ राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा। राज्यों की बिगड़ती अर्थव्यवस्था से देश की समग्र अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। हिमाचल प्रदेश की स्थिति सभी राज्यों और केंद्र सरकार के लिए एक चेतावनी है। यदि इसे नजर अंदाज किया गया, तो आने वाले समय मे इसके गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के बाद जिस तरह के दुष्परिणाम अर्थव्यवस्था में देखने को मिल रहे हैं, उससे वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी की चेतावनी दी जा रही है। जिस तरह से भारत का आयात और निर्यात प्रभावित हो रहा है, विदेशी मुद्रा की तुलना में रुपए की कीमत में लगातार गिरावट आ रही है। उसको देखते हुए कहा जाने लगा है कि आने वाला समय बहुत अधिक चुनौतियों वाला है। केंद्र एवं राज्य सरकारों को सजग रहने की जरूरत है। ईएमएस / 21 अप्रैल 26