नई दिल्ली,(ईएमएस)। इंसान का सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि उसका अपना मन होता है। मन ही वह शक्ति है जो हमें ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है और मन ही हमें गहराई में भी गिरा सकता है। यदि मन नियंत्रित हो, तब जीवन सरल, शांत और संतुलित हो जाता है; लेकिन यदि मन भटक जाए, तब यह चिंता, भय और अशांति का कारण बनता है। इसी सत्य को समझाने के लिए संतों ने अनेक कथाएँ सुनाई हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कथा प्रेमानंद महाराज द्वारा सुनाई जाती है। कथा के अनुसार, एक शिष्य ने अपने गुरु से भूत मंत्र की सिद्धि के बारे में पूछा। गुरु ने शिष्य को मंत्र बता दिया। शिष्य ने पूरी निष्ठा से साधना की और अंततः मंत्र सिद्ध हुआ। एक दिन एक भूत उसके सामने प्रकट हुआ और बोला कि वह हर काम तुरंत करेगा, लेकिन यदि मुझे काम देना बंद किया गया, तब वह शिष्य को नुकसान पहुंचाएगा। शुरुआत में शिष्य खुश हुआ और भूत को कई काम दिए, जिन्हें वह पल भर में पूरा कर देता। धीरे-धीरे काम खत्म हो गए, लेकिन भूत की मांग लगातार जारी रही। इसके बाद डरकर शिष्य अपने गुरु के पास गया। गुरु ने मुस्कुराते हुए उपाय बताया कि एक लंबा बांस गाड़कर भूत को उस पर चढ़ने-उतरने का काम दे दो। शिष्य ने ऐसा ही किया, और भूत उसी काम में व्यस्त हो गया। इस प्रकार शिष्य सुरक्षित हो गया। इस कथा का गहरा अर्थ है। भूत वास्तव में हमारा मन है और शिष्य हम स्वयं हैं। मन हमेशा सक्रिय रहना चाहता है कि अगर सही दिशा न मिले, तब वह नकारात्मक विचारों, चिंता और ओवरथिंकिंग में उलझ जाता है। गुरु का ‘बांस’ प्रतीक है किसी सकारात्मक अभ्यास का, जैसे नाम जप—‘राम-राम’, ‘राधा-राधा’ या ‘कृष्ण-कृष्ण’। जब हम अपने मन को इसतरह के सकारात्मक कार्यों में लगाते हैं, तब वह भटकता नहीं और हमें शांति मिलती है। इसलिए जीवन में मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम अपने मन को सही दिशा दें और खाली न रहने दें। आशीष दुबे / 27 अप्रैल 2026