लेख
30-Apr-2026
...


हमने शतक फ़िल्म देखा जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने पर बना है देखिए फ़िल्म में क़ोई कुछ क़ोई कुछ दिखाता है एक मनोरंजन है इसमें जो आपको शिक्षा दे उस पर ध्यान दीजिये ऐसे भी 3 घंटे की फ़िल्म से ना तो आपका स्वाभाव विल्कुल बदल जाता अगर ऐसा होता तो दंगा फसाद हो जाता इसलिए फ़िल्म से अचानक आपका विचार बदल जाएगा बिल्कुल नहीं है हाँ कुछ समय के लिए आप के विचार में परिवर्तन आता है लेकिन यदि पुनः आप जिस संगत में बैठेंगे वैसा ही आप सोचने लगते है हालांकि इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 1925 से अब तक के 100 वर्षों के इतिहास और संघर्ष को दर्शाने वाली एक ऐतिहासिक हिंदी फिल्म है, जो 20 फरवरी 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई। यह फिल्म संघ की स्थापना, बलिदान और सामाजिक योगदान को रेखांकित करती है। शतक फिल्म, राष्ट्रभक्ति और भारतीय संकल्प को समर्पित: वंदन अभिनन्दन डॉ. तेज शतक फिल्म, राष्ट्रभक्ति और संकल्प को समर्पित है।​शतक: राष्ट्र की अखंडता का महाघोष राष्ट्रवाद की ​तात्विक विवेचना एवं सर्व जन सुखाय. सर्व जन हिताय समीक्षा​राष्ट्र की आत्मा तब जागृत होती है जब उसके नागरिक अपनी विरासत और भविष्य के प्रति सजग होते हैं। धार की पावन धरा मे मेरे दशको निवास उपरान्त माँ देवी अहिल्या की इंदौर की पवित्र धरा पर निवासरत हू . इस फिल्म को दिल की गहराइयों से अवलोकित करने की की मेरी यह यात्रा केवल एक फिल्म देखने की यात्रा नहीं , बल्कि एक बोध की प्राप्ति थी। आरएसएस का हृदय से आभार, जिन्होंने मुझे इंदौर के उस प्रथम प्रीमियम शो का हिस्सा बनाया, जहाँ शतक के रूप में राष्ट्रवाद का सूरज उगते देखा गया।​एक पिता, एक शिक्षक और एक जागरूक नागरिक के रूप में, मैंने अनुभव किया कि इस फिल्म को केवल एक बार देखना पर्याप्त नहीं है। इसे सपरिवार, अपने पाँच वर्षीय अबोध बालक के साथ कम से कम दो बार देखना अनिवार्य है। क्यों? क्योंकि आज के पाँच वर्ष के बालक ही कल के भारत के नीति-निर्धारक होंगे। यदि हम उन्हें आज राष्ट्र की एकता, अखंडता और अकाट्यता का पाठ नहीं पढ़ाएंगे, तो भविष्य सुरक्षित नहीं होगा।​शताब्दी का महाशंखनाद: शतक – संघ के १०० गौरवशाली वर्ष​यह केवल एक चलचित्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण की वह महागाथा है, जिसने एक पूरी शताब्दी को अपने निस्वार्थ सेवा-भाव से सींचा है। शतक: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के १०० वर्ष वह ऐतिहासिक फीचर फिल्म है, जो १९ फरवरी २०२६ को संपूर्ण भारत के सिनेमाघरों में एक नए युग का सूत्रपात कर of चुकी है। १९२५ के उस संकल्प से लेकर २०२५ की सिद्धियों तक, यह फिल्म राष्ट्र-निर्माण के उस अदृश्य पथ को रूपहले पर्दे पर जीवंत करती है, जिसे संघ ने अपने पसीने और तपस्या से बनाया है।​महागाथा का स्वरूप​आशीष मॉल के कुशल निर्देशन और अनिल डी. अग्रवाल की ओजस्वी परिकल्पना से सजी यह फिल्म, अजय देवगन की उस गूँजती और गंभीर आवाज़ में पिरोई गई है, जो श्रोताओं के हृदय में राष्ट्रवाद का ज्वार उठा देती है। फिल्म की प्रत्येक कड़ी, संघ के वैचारिक अधिष्ठान, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक अभ्युदय के उन अनछुए पहलुओं को उजागर करती है, जिन्होंने आधुनिक भारत की नियति को गढ़ा है।​संगीत और स्वर​जब सुखविंदर सिंह की बुलंद आवाज़ में फिल्म का मुख्य गान भगवा है अपनी पहचान गूँजता है, तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि करोड़ों स्वयंसेवकों के संकल्प की हुंकार बन जाता है। यह संगीत उस अस्मिता का प्रतीक है, जो सदियों की सुप्त चेतना को जागृत करने का सामर्थ्य रखती है।​ऐतिहासिक यात्रा: संकल्प से सिद्धि तक​वीर कपूर द्वारा निर्मित यह महाकाव्य, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा १९२५ में रोपे गए उस बीज की कहानी है, जो आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। फिल्म उन ऐतिहासिक झंझावातों को भी साहस के साथ दर्शाती है, जिनमें आपातकाल जैसे कठिन समय में संघ की अडिग भूमिका और राष्ट्र के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को परखा गया।​डॉ. हेडगेवार के प्रथम चरण से लेकर आज के सेवा कार्यों और वैश्विक पहचान तक, शतक हमें उन गलियों और गाँवों में ले जाती है जहाँ स्वयंसेवकों ने बिना किसी प्रचार के राष्ट्र की सेवा को ही अपना परम धर्म माना। यह फिल्म उन लाखों गुमनाम नायकों को एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपना जीवन भारत माता के चरणों में समर्पित कर दिया।​​शतक फिल्म की देखने के उपरांत में 11 मर्मभेदी एवं ओजस्वी संवाद मेरे मन की भावना के अनुरूप अभिवाक अभिव्यक्त हैं वैदिक​फिल्म केवल दृश्यों का समूह नहीं, बल्कि वैदिक मंत्रों का उच्चारण है। मेरी अभिव्यक्ति जो रोंगटे खड़े कर देने वाली है , बच्चों तक को बच्चों तक को फिल्म को दिखाने में मदद मिलेगी :​शतक केवल संख्या नहीं, यह सौ वर्षों के आरएसएस का संघर्ष, बलिदानों और संकल्पों की वह शक्ति है जो भारत को पुनः विश्वगुरु बनाएगी।​जब तक घर का हर बच्चा अपनी मिट्टी को तिलक नहीं लगाता, तब तक सरहद पर खड़ा सैनिक सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता।​शत्रु की तलवार से अधिक घातक अपनों की उदासीनता होती है; जागो! इससे पहले कि इतिहास तुम्हें विस्मृत कर दे।​अखंडता कोई समझौता नहीं है, यह हमारा अस्तित्व है। खंडित भारत एक शरीर है जिसकी आत्मा छटपटा रही है।​मेरे रक्त की हर बूँद में शतक का संकल्प है—जब तक एक भी राष्ट्रविरोधी जीवित है, मेरा विश्राम हराम है।​सत्ताएँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र की संस्कृति सनातन है। इस संस्कृति की रक्षा ही हमारा परम धर्म है।​इंदौर की गलियों से लेकर पूरे राष्ट्र एवं विश्व भर में सनातन धर्मावलम्बियो भारतीयो तक,गूँज एक ही होनी चाहिए—भारत माता की जय!​इतिहास पन्नों में नहीं, पूर्वजों के बलिदानों में होता है। फिल्म शतक उन्हीं बलिदानों का डिजिटल अभिषेक है।​कायर वह नहीं जो युद्ध हार जाए, कायर वह है जो युद्ध के मैदान में उतरने से पहले ही वैचारिक हार मान ले।​अपनी संतानों को विरासत में संपत्ति दें या न दें, पर राष्ट्रभक्ति का ऐसा संस्कार अवश्य दें कि वे देश के लिए मर मिटना गौरव समझें।​अकाट्यता हमारी पहचान है। हमें न कोई काट पाया है, न कोई बाँट पाएगा—शतक यही सत्य सिद्ध करती है।​5 महान हिंदी कवि और उनकी अमर रचनाएँ, नई पीढ़ी को अवश्य याद करावें​साहित्य समाज का दर्पण होता है और राष्ट्रवाद की मशाल। मात्र विचारों को पुष्ट करते हुए ये पाँच कविताएँ शतक के मूल संदेश को परिभाषित करती हैं:​1. पं. माखनलाल चतुर्वेदी - पुष्प की अभिलाषा​चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ... मुझे तोड़ लेना वनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।​विवेचना:शतक देखने का आग्रह इसी पुष्प की अभिलाषा का विस्तार है। जैसे पुष्प वैभव के बजाय बलिदान के मार्ग को चुनता है, वैसे ही यह फिल्म हमें व्यक्तिगत सुखों से ऊपर उठकर राष्ट्र-पथ पर चलने की प्रेरणा देती है।​2. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर - रश्मिरथी​क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसका क्या जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल हो।​विवेचना: शतक फिल्म में जो शक्ति और सामर्थ्य दिखाया गया है, वह दिनकर जी की इन पंक्तियों का साक्षात रूप है। शांति केवल सामर्थ्यवान को ही शोभा देती है। राष्ट्र को अखंड रखने के लिए शक्ति संचय अनिवार्य है।​3. सुभद्रा कुमारी चौहान - झाँसी की रानी​खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।​विवेचना: यह कविता वीरता का पर्याय है। फिल्म शतक में स्त्री शक्ति और मातृशक्ति का जो स्वरूप चित्रित है, वह झाँसी की रानी के उसी अदम्य साहस की याद दिलाता है। बच्चों को यह फिल्म दिखाना, उन्हें इसी साहस से परिचित कराना है।​4. जयशंकर प्रसाद - हिमाद्रि तुंग श्रृंग से​प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्ज्वला! स्वतंत्रता पुकारती!​विवेचना: यह एक प्रयाण गीत है। शतक फिल्म को देखने का अनुभव भी एक आध्यात्मिक और राष्ट्रीय प्रयाण जैसा है, जहाँ दर्शक स्वयं को स्वतंत्र और प्रबुद्ध भारत का रक्षक अनुभव करता है।​5. सोहनलाल द्विवेदी - कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती​(या उठो धरा के अमर सपूतों)​नया प्रात है, नई बात है, नई किरण है, ज्योति नई...​विवेचना: शतक एक नए भारत के उदय की फिल्म है। यह टूटे हुए मनोबल को जोड़कर पुनरुत्थान की बात करती है, जैसा द्विवेदी जी ने अपनी कविताओं में सदा आह्वान किया। ​101 कारण: शतक को सिनेमाघर में बड़े पर्दे पर ही क्यों देखें?​प्रमुख श्रेणियों में विभाजित अनिवार्य कारण दिए गए हैं:​राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए (1-20)​यह फिल्म भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक मानचित्र को हृदय में अंकित कर देती है।​यह दिखाती है कि अखंड भारत केवल एक स्वप्न नहीं, बल्कि हमारा अधिकार है।​सीमाओं पर होने वाले षड्यंत्रों को समझने की दृष्टि प्रदान करती है।​एक देश, एक विधान, एक निशान के संकल्प को जीवंत करती है।​यह अलगाववाद की जड़ों पर प्रहार करने वाली फिल्म है।​राष्ट्र के प्रति स्व के भाव को जागृत करती है।​यह सिखाती है कि धर्म से बड़ा राष्ट्रधर्म होता है।​बाहरी आक्रमणों से अधिक खतरनाक आंतरिक गद्दारों की पहचान करना सिखाती है।​एकता के धागे में पिरोने वाले ऐतिहासिक प्रसंगों का अनूठा संग्रह है।​यह फिल्म हर नागरिक को एक सैनिक बनने की प्रेरणा देती है। (10 कारण जो राष्ट्र की संप्रभुता को समर्पित हैं) 10 कारण ​बच्चों और भावी पीढ़ी के भविष्य हेतु (21-40)​आपके 5 वर्षीय बालक के कोमल मन पर राष्ट्रभक्ति का अमिट प्रभाव पड़ेगा। ​पाठ्यपुस्तकों में जो इतिहास दबा दिया गया, वह यहाँ स्क्रीन पर सजीव है।​बच्चों को मोबाइल गेम्स से निकालकर वास्तविक नायकों से परिचित कराती है।​यह संस्कार देती है कि स्वतंत्रता मुफ्त नहीं मिली है।​बच्चों में तर्क शक्ति विकसित करती है कि क्यों राष्ट्र प्रथम है।​यह फिल्म एक विजुअल एनसाइक्लोपीडिया है।​भावी पीढ़ी को विशुद्ध भारतीय दृष्टिकोण प्रदान करती है।​बच्चों को अनुशासन और शौर्य का पाठ पढ़ाती है।​यह फिल्म उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए वैचारिक सुरक्षा कवच है।​ उन्हें अपने पूर्वजों के बलिदान पर गर्व करना सिखाती है। (अन्य कारण जो संतानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए हैं) ​सिनेमाई उत्कृष्टता और प्रभाव (41-60)​बड़े पर्दे पर फिल्म का स्केल आँखों को राष्ट्र की विशालता का अनुभव कराता है।​साउंड इफ़ेक्ट्स ऐसे हैं कि भारत माता की जय का घोष आपके सीने में कंपन पैदा कर देगा।​यह भारतीय सिनेमा की तकनीकी प्रगति का उत्कृष्ट उदाहरण है।​थिएटर में साथ बैठे लोगों के साथ जब आप राष्ट्रगान गाते हैं, तो वह एकता का अनुभव अद्भुत होता है।​फिल्म के एक्शन दृश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं, जो भारतीय सामर्थ्य दिखाते हैं।​सिनेमैटोग्राफी भारत की प्राकृतिक सुंदरता को स्वर्ग की तरह दिखाती है।​संगीत ऐसा है जो रोंगटे खड़े कर दे और मन को शांत भी करे।​संपादन इतना चुस्त है कि आप एक पल के लिए भी पलक नहीं झपका पाएंगे।​कलाकारों का अभिनय इतना जीवंत है कि वे पात्र नहीं, साक्षात महापुरुष लगते हैं।​फिल्म की लाइटिंग और कलर पैलेट भारतीय संस्कृति के रंगों को उभारता है। (अन्य 10 कारण जो कलात्मक श्रेष्ठता को दर्शाते हैं) 10 कारण ​आरएसएस और वैचारिक अधिष्ठान के लिए (61-80)​यह फिल्म उस विचारधारा को पुष्ट करती है जो व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की बात करती है।​आरएसएस के स्वयंसेवकों के त्याग और समर्पण की अदृश्य छाया इस फिल्म में दिखती है।​यह समाज को संगठित होने का संदेश देती है।​स्वदेशी और स्वभाषा के गौरव को पुनर्स्थापित करती है।​इंदौर जैसे केंद्रों में इस तरह के प्रीमियम शो समाज के प्रबुद्ध वर्ग को जोड़ने का माध्यम हैं।​यह फिल्म छुआछूत और भेदभाव के विरुद्ध एक वैचारिक युद्ध है।​राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता कैसे व्यक्त की जाए, यह फिल्म इसका मार्ग बताती है।​यह भारतीय मूल्यों और पश्चिमी विकृतियों के बीच का अंतर स्पष्ट करती है।​फिल्म का हर दृश्य एक शाखा की तरह अनुशासन सिखाता है।​यह फिल्म हिंदू समाज के पुनरुत्थान का एक सशक्त दस्तावेज है। (अन्य 10 कारण जो सामाजिक संगठन को समर्पित हैं) और 11कारण ​डॉ. तेज प्रकाश व्यास के स्वयं प्रणीत विशेष 21 कारण (81-101)​धार की ऐतिहासिक चेतना को इंदौर के आधुनिक मंच पर सम्मानित करने के लिए।​एक शिक्षार्थी के रूप में जीवनभर सीखने की ललक को जीवित रखने के लिए।​फिल्म को दो बार देखना इसलिए जरूरी है क्योंकि पहली बार में हम दृश्य देखते हैं, दूसरी बार में दर्शन।​अपनी संतानों के भविष्य को वैचारिक प्रदूषण से बचाने के लिए।​समाज में यह संदेश देने के लिए कि प्रबुद्ध वर्ग भी सिनेमा को गंभीरता से लेता है।​राष्ट्र की अकाट्यता का अनुभव करने के लिए।​प्रीमियम शो के गौरव को राष्ट्र के गौरव से जोड़ने के लिए।​फिल्म के संवादों को अपने जीवन में उतारने के लिए।​यह सिद्ध करने के लिए कि हम केवल दर्शक नहीं, राष्ट्र के प्रहरी हैं। समापान बिंदु को स्कंद पुराण के नागर खंड में वर्णित कलम कडची और बरछी को शतक फिल्म में जनेऊ तिलक चोटी और टोपी का पर्यायवाची तथा जीवन रक्षात्मक मानता हू . 101 कारणों की गहराई को समझने के लिए जो एक राष्ट्रभक्त के हृदय में उपजते हैं। ...​क्योंकि शतक देखना एक मनोरंजन नहीं, एक राष्ट्रीय अनुष्ठान है।​डॉ. तेज प्रकाश पूर्णानंद व्यास का संकल्प भी भारत की विजय का मार्ग है।​ संदेश: एक नए युग का सूत्रपात फिल्म शतक का यह विश्लेषण केवल एक रिव्यू नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक घोषणापत्र है. इस शो का साक्षी बनना और फिर उसे आत्मसात करना, स्वयं के लिए अगाध देशभक्ति को दर्शाता है।​जब हम अपने 5 वर्ष के बच्चों को शतक जैसी फिल्में दिखाते हैं, तब हम उनके हाथों में केवल पॉपकॉर्न नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा की कमान सौंप रहे होते हैं। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि हम उस देश के वासी हैं जहाँ पुष्प भी शहीदों के चरणों में गिरना चाहता है।​आरएसएस को धन्यवाद देना मेरी कृतज्ञता का भाव है।आदरणीय सुरेंद्र जी जैन के प्रति विशेष कृतज्ञता प्रकट करता हूं, जिन्होनें निमंत्रन देकर इस फिल्म का सहभागी बनाकर एक प्रेरक चिंतन राष्ट्र सम्मुख प्रकट करने का सुअवसर प्रदान किया। वास्तव में, जब समाज और संगठन एक होकर शतक जैसे प्रयासों को अपनाते हैं, तभी राष्ट्र की अखंडता अकाट्य बनती है।​राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम।​ (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 30 अप्रैल 26