अंतर्राष्ट्रीय
10-May-2026
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मक्का (ईएमएस)। पवित्र शहर में मस्जिद-ए-हराम के करीब एक ऐसा कब्रिस्तान मौजूद है, जिसकी उम्र हज़ार साल से भी अधिक बताई जाती है। यह कब्रिस्तान सिर्फ अपनी प्राचीनता के लिए ही नहीं, बल्कि यहां दफ़न की गई हस्तियों के कारण भी अत्यंत पूजनीय है। इस बेहद पवित्र कब्रिस्तान का नाम जन्नतुल मुअल्ला है, जिसे अल-हजून के नाम से भी जाना जाता है। यहीं पर पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पहली पत्नी हजरत खदीजा रजि. अल्लाहु अन्हा, उनकी मां हजरत आमिना, दादा हजरत अब्दुल मुत्तलिब समेत अनेक सहाबा और इस्लाम के शुरुआती दौर के महत्वपूर्ण व्यक्तियों को अंतिम आरामगाह मिली है। मुसलमानों की मान्यता है कि इस कब्रिस्तान में दफन होने वाले लोगों को खास बरकत मिलती है और जन्नत की राह आसान होती है। जन्नतुल मुअल्ला की एक अनूठी प्रथा है, जो सदियों से चली आ रही है और इसकी एक खास वजह है। चूंकि यहां जगह सीमित है और लाखों मुसलमानों को समय के साथ दफनाया जा चुका है, इसलिए जब शरीर पूरी तरह सड़ जाता है, तो कब्र खोदकर हड्डियों को सम्मानपूर्वक इकट्ठा कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया इस्लामी नियमों के अनुसार बेहद सम्मानजनक तरीके से की जाती है। इन हड्डियों को सुरक्षित स्थानों पर संभालकर रखा जाता है, जिससे नई लाशों को दफनाने के लिए जगह बनाई जा सके। कई रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पवित्र भूमि पर लाखों-करोड़ों मुसलमानों की आखिरी आरामगाह है। समय के साथ कब्रिस्तान का विस्तार हुआ है, लेकिन इसका मूल और सबसे पवित्र हिस्सा आज भी अपनी जगह पर बरकरार है। 1920 के दशक में सऊदी शासन के दौरान, कब्रों पर बने गुंबद और संरचनाओं को हटा दिया गया था ताकि शिर्क जैसी प्रथाओं से बचा जा सके, जिसमें कब्रों की अत्यधिक पूजा करना शामिल था। आज यहां केवल साधारण पत्थरों के ढेर ही निशान के रूप में दिखते हैं, जो इस्लाम की सादगी को दर्शाते हैं। जन्नतुल मुअल्ला का ऐतिहासिक महत्व इस्लाम से पहले के ज़माने से भी है और पैगंबर साहब के दौर में भी इसका उपयोग किया जाता था। हजरत खदीजा रजि. की कब्र इस कब्रिस्तान की सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह पैगंबर मुहम्मद की पहली पत्नी थीं और इस्लाम के शुरुआती दिनों में उनका बहुत बड़ा योगदान था। पैगंबर साहब अक्सर यहां आकर दुआ करते थे, जिससे इस जगह की आध्यात्मिक गरिमा और बढ़ जाती है। इस पवित्र स्थान को “उच्चतम जन्नत” के नाम से भी पुकारा जाता है, जो इसकी अलौकिक महत्ता को दर्शाता है। आज भी हज और उमरा करने वाले लाखों श्रद्धालु इस कब्रिस्तान में जाकर फातिहा पढ़ते हैं और अपने प्रियजनों तथा सभी मुसलमानों के लिए दुआएं मांगते हैं। हालांकि यहां कोई भव्य इमारत या कब्र का पत्थर नहीं है, केवल साधारण पत्थरों के ढेर ही निशान के रूप में दिखते हैं, फिर भी इसकी रूहानी अहमियत और आकर्षण दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अटूट है। आधुनिक समय में, मक्का में लाखों हज यात्री आते हैं और शहर का तेजी से विस्तार हो रहा है। ऐसे में पवित्र स्थलों की रक्षा और उनका उचित प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। कब्रिस्तान में जगह की सीमितता के कारण ऊपर बताई गई प्रथा आज भी जारी है, जो एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गई है। यह प्रथा इस्लाम की सादगी, जीवन की नश्वरता और आखिरत की हकीकत की याद दिलाती है। कुरान में भी बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि दुनिया फानी है और आखिरत ही असली और शाश्वत जीवन है। कई मुसलमान इस कब्रिस्तान को जन्नत की सीढ़ी मानते हैं और यहां दफन होने वालों को खास सम्मान मिलता है। हालांकि, पुरानी संरचनाओं को हटाए जाने को लेकर कुछ विवाद भी रहे हैं, लेकिन आज यह जगह सादगी और इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप है। सुदामा/ईएमएस 10 मई 2026