आज का मेरा यह आलेख उस बालक के नाम है जो आज 37 साल का हो चुका होगा, जो शायद आज भी किसी खिड़की से बाहर देखते हुए अपनी आज़ादी का सपना देखता होगा। यह उन हज़ारों माताओं के नाम है जिनके बच्चे उनसे दूर सरकारी इमारतों में अपनी पहचान खो रहे हैं। इतिहास की क्रूरता अक्सर उन पन्नों में दर्ज होती है जहाँ सत्ता अपनी असुरक्षा को छिपाने के लिए मासूमियत का गला घोंट देती है। आज से ठीक इकतीस वर्ष पूर्व, जब हिमालय की चोटियों पर बर्फ पिघल रही थी, तब छह वर्षीय गेधुन चोएक्यी न्यिमा—जिन्हें 11वें पंचेन लामा के रूप में पहचाना गया था उन्हे चीनी तंत्र द्वारा अपनी गिरफ्त में ले लिया गया। यह केवल एक बच्चे का अपहरण नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक घेराबंदी थी, जिसका उद्देश्य तिब्बत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रीढ़ को तोड़ना था। व्यावहारिक रूप से समझें तो चीन के लिए पंचेन लामा का पद मात्र धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक नियंत्रण का एक अनिवार्य उपकरण है। तिब्बती परंपरा के अनुसार, पंचेन लामा ही अगले दलाई लामा की पहचान और पुष्टि करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। ऐसे में, पंचेन लामा को गायब कर और उनके स्थान पर अपनी पसंद का कठपुतली चेहरा बिठाकर,चीनी कम्युनिस्ट पार्टी भविष्य के दलाई लामा की चयन प्रक्रिया को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेना चाहती है। यह आध्यात्मिक उत्तराधिकार पर एक ऐसा राजनीतिक कब्ज़ा है, जिससे आने वाले दशकों में तिब्बत के भीतर विद्रोह के स्वर को जड़ से खत्म किया जा सके। चीन जानता है कि पंचेन लामा और दलाई लामा का रिश्ता गुरु-शिष्य का है और एक-दूसरे के पुनर्जन्म को पहचानने में उनकी भूमिका निर्णायक होती है। गेडुन को गायब कर अपने कठपुतली पंचेन लामा को थोपना, तिब्बत के भविष्य और उनकी धार्मिक परंपरा को हमेशा के लिए बंधक बनाने का प्रयास है। यकीनन पंचेन लामा का गायब होना उस व्यापक अभियान का हिस्सा है जिसे सिनीसाइजेशन यानी चीनीकरण कहा जाता है। आज तिब्बत में चीन द्वारा संचालित औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूल इसी दमनकारी नीति की अगली कड़ी हैं। लगभग 10 लाख तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से दूर कर इन सरकारी हॉस्टलों में रखना कोई सामान्य शिक्षा नीति नहीं, बल्कि उनकी भाषा, बौद्ध धर्म और पारंपरिक जड़ों को काटकर उनमें हान-चीनी पहचान भरने का एक व्यवस्थित प्रयास है। जब एक पूरी पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल जाती है, तो सांस्कृतिक संघर्ष स्वतः ही दम तोड़ देता है। आज दुनिया मानवाधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन पंचेन लामा का मामला संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की उस व्यावहारिक लाचारी को दर्शाता है, जहाँ चीन की आर्थिक शक्ति और वीटो की ताकत ने न्याय के तराजू को असंतुलित कर दिया है। तीन दशकों से एक व्यक्ति का अदृश्य होना और दुनिया का उसे एक ठंडा बस्ता मान लेना, आधुनिक सभ्य समाज की सबसे बड़ी नैतिक विफलता है। इस घोर अंधकार और दमन के बीच भारत एक प्रकाश स्तंभ की तरह अडिग खड़ा है, जिसने तिब्बती अस्मिता और उनकी सिसकती आस्था को अपनी ममतामयी गोद में शरण दी है। आज दुनिया भर में जो तिब्बत मुक्ति आंदोलन की गूँज सुनाई देती है, उसका केंद्र भारत की वही लोकतांत्रिक मिट्टी है जहाँ दलाई लामा जी सुरक्षित रहकर विश्व को शांति और करुणा का संदेश दे रहे हैं। भारत का यह सहयोग केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि एक रूहानी और ऐतिहासिक जुड़ाव है जिसने तिब्बत की उम्मीदों को मरने नहीं दिया। एक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मुझे ऐसा लगता है कि पंचेन लामा का मुद्दा केवल तिब्बत का आंतरिक मामला नहीं, बल्कि यह चेतना की स्वतंत्रता का वैश्विक प्रश्न है। हम अक्सर किसानों के एमएसपी और मज़दूरों के अधिकारों की बात करते हैं क्योंकि वे उनके अस्तित्व और प्राण-नीति से जुड़े हैं, ठीक उसी तरह किसी समाज की सांस्कृतिक पहचान का अधिकार भी उसके अस्तित्व का मौलिक आधार होता है। यदि हम आज चीनी शासन द्वारा किए जा रहे इस दमन पर मौन हैं, तो हम एक ऐसे भविष्य को स्वीकार कर रहे हैं जहाँ शक्ति ही सत्य का निर्धारण करेगी। 17 मई की तारीख केवल एक कैलेंडर का पन्ना नहीं, बल्कि विश्व की सामूहिक चेतना की परीक्षा है। चीन का यह तर्क कि पंचेन लामा सुरक्षित हैं, दरअसल एक अधिनायकवादी राज्य का वह पर्दा है जिसके पीछे सच्चाई को दफन किया जा रहा है। समय आ गया है कि दुनिया आर्थिक हितों के चश्मे को उतारकर उस अदृश्य चेहरे की आवाज़ बने, क्योंकि जब तक आस्था और संस्कृति की इन हथकड़ियों को नहीं तोड़ा जाता, तब तक मानवीय गरिमा का दावा अधूरा ही रहेगा। न्याय की यह पुकार आज एक ऐसी गूँज बन चुकी है जिसे अब दुनिया अनदेखा नहीं कर सकती। पिछले तीन दशकों से तिब्बत वूमेन एसोसिएशन (सेंट्रल)की हज़ारों सदस्य और अंतरराष्ट्रीय संगठन संयुक्त राष्ट्र के मंच से चीनी सरकार से जवाब माँग रहे हैं, मगर बीजिंग की ओर से केवल टालमटोल ही हाथ लगी है। यह महज़ एक राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि उन लाखों तिब्बतियों की आस्था का प्रश्न है जिनकी धार्मिक मान्यताओं और पुनर्जन्म की पवित्र परंपराओं पर आदेश संख्या 5 के ज़रिए सीधा प्रहार किया गया है। चीन का यह कदम छह मिलियन तिब्बतियों की पहचान को कुचलने की एक क्रूर कोशिश है। इसीलिए आज दुनिया भर की सरकारों और मानवाधिकार निकायों से यह पुरजोर माँग की जा रही है कि पंचेन लामा की सुरक्षा और उनके ठिकाने को लेकर चीन पर दबाव बनाया जाए। तिब्बत वूमेन एसोसिएशन का यह अडिग विश्वास कि पंचेन लामा की सुरक्षा मानवीय गरिमा का प्रश्न है, आज वैश्विक समुदाय को इस लड़ाई से जोड़ रहा है। यह सक्रियता साफ संदेश देती है कि जब तक न्याय का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिल जाता तब तक, यह प्रतीक्षा एक इबादत की तरह जारी रहेगी, यह सिसकी एक आंदोलन की तरह गूंजती रहेगी और भारत की पावन धरती से शुरू हुई न्याय की यह लड़ाई अपनी मंजिल तक पहुँच कर ही दम लेगी। दुनिया सुन ले, जब तक पंचेन लामा सुरक्षित अपनों के बीच नहीं आ जाते, तिब्बत की ये बेटियाँ, ये बहनें और ये माँएँ अपनी आवाज़ को और प्रखर करती रहेंगी। न्याय की यह पुकार अब थमने वाली नहीं है! आज जब 17 मई की तारीख कैलेंडर पर आती है, तो यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक जवाबदेही बनकर आती है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारे पड़ोस में, हिमालय की गोद में एक ऐसी सभ्यता सिसक रही है जिसे जबरन चुप कराया जा रहा है। हमारी चुप्पी भी इस अपराध में हिस्सेदारी है। अगर हम आज पंचेन लामा की रिहाई की मांग नहीं करते, अगर हम उन बच्चों के लिए आवाज़ नहीं उठाते जिन्हें उनके संस्कारों से दूर किया जा रहा है, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि जब इंसानियत को कैद किया जा रहा था, तब आप क्या लिख रहे थे? ईएमएस/16/05/2026