राष्ट्रीय
30-May-2026
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-कार्यभार संभालने से पहले शिवकुमार के सामने मंत्रियों की परिषद चुनने की चुनौती नई दिल्ली,(ईएमएस)। कर्नाटक में बड़ी राजनीतिक हलचल के बीच सिद्दरमैया ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और उम्मीद है कि डीके शिवकुमार राज्य के नए सीएम होंगे। कर्नाटक के नए सीएम के सामने कई चुनौतियां भी होंगी जिनमें राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक चुनौतियां हैं। इनमें नई कैबिनेट में क्षेत्रीय और जातिगत समीकरणों को संतुलित करने से लेकर, वित्तीय दबाव के बीच कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखना और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मेकेदातु जलाशय मुद्दे को सुलझाना शामिल है। ये काम शिवकुमार के लिए मुश्किलों भरा रहने वाला है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक औपचारिक रूप से कार्यभार संभालने से पहले ही शिवकुमार के सामने मंत्रियों की परिषद चुनने की बड़ी चुनौती है। शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौतियों में से एक अहिंदा के उस समर्थन आधार को बनाए रखना है, जिसे सिद्दरमैया ने बड़ी मेहनत से तैयार किया था। अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के इस सामाजिक गठबंधन ने 2023 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी में अहम भूमिका निभाई थी और यह पार्टी की चुनावी रणनीति का मुख्य केंद्र बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उन्हें अहिंदा समुदायों को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनके हितों की रक्षा आगे भी होती रहेगी। जरा सी भी अनदेखी या नाराजगी बीजेपी-जेडीएस को अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का मौका दे सकती है। इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखना राजनीतिक रूप से बेहद जरूरी होगा। सिद्दरमैया के साथ तालमेल बिठाकर काम करने की शिवकुमार की क्षमता ही यह तय करेगी कि 2028 में कांग्रेस सत्ता की बागडोर दोबारा संभाल पाती है या नहीं। बता दें सिद्दरमैया ने राज्य की राजनीति में सक्रिय रहने का प्रण लिया है। कांग्रेस की मुख्य गारंटी योजनाओं को जारी रखते हुए राज्य के वित्त का प्रबंधन करना एक मुश्किलभरा काम साबित हो सकता है। सरकार पहले से ही पांच योजनाओं पर सालाना लगभग 51,000 करोड़ रुपए खर्च कर रही है, जिसमें गृह लक्ष्मी, शक्ति, अन्न भाग्य, युवा निधि और गृह ज्योति जैसी योजनाएं शामिल हैं। राजस्व जुटाना, बढ़ती सब्सिडी की प्रतिबद्धताएं और उधार लेने की सीमाएं मुख्य चिंताएं बनी रहेंगी लेकिन कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करने से राजनीतिक जोखिम हो सकते हैं। कर संग्रह में सुधार, निवेश आकर्षित करना और खर्च को प्राथमिकता देना मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। बेंगलुरु से बाहर विकास का विस्तार करना और कृषि संबंधी चिंताओं को दूर करना एक और अहम क्षेत्र है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। भले ही बेंगलुरु निवेश, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक ध्यान के मामले में हावी बना हुआ है, लेकिन उत्तरी और ग्रामीण कर्नाटक के प्रतिनिधियों ने लगातार इन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देने की मांग की है। कई जिलों के किसानों को सूखे, सिंचाई की कमी, फसलों के नुकसान और बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। बेंगलुरु की शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर की मांगों और ग्रामीण विकास की उम्मीदों के बीच संतुलन बनाने के लिए संसाधनों का सोच-समझकर बंटवारा करना होगा। शिवकुमार के प्रशासन का मूल्यांकन न केवल बेंगलुरु के विकास से होगा, बल्कि इस बात से भी होगा कि विकास छोटे शहरों तक पहुंच पाता है या नहीं। मेकेदातु बैलेंसिंग रिजर्वोयर प्रोजेक्ट और कावेरी नदी से जुड़े बड़े विवाद के संवेदनशील राजनीतिक चुनौतियों के रूप में सामने आने की उम्मीद है। 2023 के चुनावों से पहले कनकपुरा से बेंगलुरु तक पदयात्रा करके मेकेदातु प्रोजेक्ट की जोरदार वकालत करने वाले शिवकुमार पर सीएम के तौर पर इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का भारी दबाव होगा। पड़ोसी राज्य तमिलनाडु ने कावेरी नदी के पानी में अपने हिस्से को लेकर चिंताओं का हवाला देते हुए लगातार इसका विरोध किया है। सिराज/ईएमएस 30मई26