नई दिल्ली (ईएमएस)। बच्चों के विकास की अपनी एक स्वाभाविक गति होती है और उनसे उनकी उम्र से पहले किसी व्यवहार या जिम्मेदारी की अपेक्षा करना उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर असर डाल सकता है। यह मानना है पेरेंटिंग विशेषज्ञों का। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को सही उम्र में सही बातें सिखाने से वे बिना दबाव के बेहतर तरीके से सीखते हैं और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है। विशेषज्ञ बताती हैं कि कई माता-पिता बच्चों को जल्दी अलग सुलाने की कोशिश करते हैं, जबकि अधिकांश बच्चे सात वर्ष की उम्र के आसपास या उसके बाद भावनात्मक रूप से इतने परिपक्व हो पाते हैं कि वे अपने कमरे या अलग बिस्तर पर सहज महसूस कर सकें। यदि बच्चा अभी भी माता-पिता के साथ सोना चाहता है, तो इसे गलत आदत मानकर दबाव बनाने की बजाय धीरे-धीरे उसे स्वतंत्रता के लिए तैयार करना अधिक प्रभावी होता है। ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को लेकर भी माता-पिता अक्सर चिंतित रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पांच से छह वर्ष की उम्र से पहले बच्चों का लंबे समय तक एक ही काम पर ध्यान बनाए रखना स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। इस आयु में बच्चे खेल और गतिविधियों के माध्यम से अधिक सीखते हैं। इसलिए पढ़ाई के दौरान उनका बार-बार उठना-बैठना या इधर-उधर देखना सामान्य व्यवहार माना जाना चाहिए। बेहतर होगा कि उन्हें छोटे-छोटे समय के लिए पढ़ाया जाए और बीच-बीच में विश्राम दिया जाए। बच्चों को जिम्मेदारी सिखाने की शुरुआत तीन से चार वर्ष की उम्र से की जा सकती है। इस आयु में वे सरल निर्देश समझने लगते हैं। उन्हें खिलौने समेटकर रखने या अपनी चीजें व्यवस्थित करने जैसी छोटी आदतें सिखाई जा सकती हैं। शुरुआत में बच्चे गलतियां करेंगे, लेकिन नियमित अभ्यास और प्रोत्साहन से वे धीरे-धीरे जिम्मेदारी समझने लगते हैं। होमवर्क और पढ़ाई के मामले में सात से आठ वर्ष की उम्र बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस समय माता-पिता को हर समय उनके साथ बैठने के बजाय उन्हें स्वयं प्रयास करने का अवसर देना चाहिए। इससे समस्या समाधान की क्षमता और आत्मविश्वास दोनों विकसित होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार साझा करना भी एक ऐसी आदत है जो समय के साथ विकसित होती है। लगभग चार से पांच वर्ष की उम्र में बच्चे दूसरों की भावनाओं को बेहतर ढंग से समझना शुरू करते हैं। सुदामा/ईएमएस 11 जून 2026