लेख
12-Jun-2026
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घटते जनाधार और बदलती परिस्थितियों ने बढ़ाई नजदीकियां दिल्ली में राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की मुलाकात तथा उससे पहले सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच हुई बातचीत ने राष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। इन बैठकों को लेकर भले ही किसी भी पक्ष ने औपचारिक रूप से किसी गठबंधन या विलय की संभावना की पुष्टि नहीं की हो, लेकिन राजनीति में संकेतों का महत्व हमेशा शब्दों से अधिक माना जाता है। विशेष रूप से तब, जब दोनों दल अपने-अपने राजनीतिक जीवन के कठिन दौर से गुजर रहे हों। ऐसे समय में लगातार हो रही मुलाकातें केवल शिष्टाचार तक सीमित नहीं मानी जा सकतीं। इनके पीछे बदलते राजनीतिक समीकरणों और भविष्य की रणनीतियों की झलक भी दिखाई देती है। भारतीय राजनीति में कांग्रेस कभी देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी रही है। स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और लंबे समय तक केंद्र तथा राज्यों में सत्ता के कारण कांग्रेस का प्रभाव लगभग पूरे देश में फैला हुआ था। लेकिन पिछले एक दशक में पार्टी का जनाधार लगातार कमजोर हुआ है। कई राज्यों में उसका संगठन लगभग निष्क्रिय हो चुका है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस अब मुख्य राजनीतिक शक्ति नहीं रह गई है। राष्ट्रीय स्तर पर भी उसका वोट प्रतिशत और सीटों की संख्या पहले की तुलना में काफी घट चुकी है। कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वह भाजपा के उभार के सामने एक प्रभावी वैकल्पिक राजनीतिक कथा प्रस्तुत नहीं कर सकी। कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई। कहीं जातीय राजनीति ने जगह बनाई तो कहीं क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा कांग्रेस पर भारी पड़ा। परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस का प्रभाव सीमित क्षेत्रों तक सिमटता गया। हालांकि राहुल गांधी की यात्राओं और विपक्षी एकता के प्रयासों ने पार्टी को कुछ हद तक राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बनाए रखा, लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस अभी तक अपनी पुरानी ताकत हासिल नहीं कर सकी है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में तीन दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही वामपंथी सरकार को हटाकर एक नई राजनीतिक शक्ति खड़ी की थी। बाद में उन्होंने भाजपा की चुनौती का भी सफलतापूर्वक मुकाबला किया। एक समय ऐसा लगा कि तृणमूल कांग्रेस केवल बंगाल तक सीमित पार्टी नहीं रहेगी बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। गोवा, त्रिपुरा और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में पार्टी ने विस्तार की कोशिशें भी कीं। लेकिन राजनीति में सफलता स्थायी नहीं होती। यदि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को अपेक्षित समर्थन नहीं मिलता और पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ता है, तो यह उसके लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। किसी भी क्षेत्रीय दल की ताकत उसके मजबूत संगठन और निर्विवाद नेतृत्व पर आधारित होती है। जब संगठन में टूट-फूट शुरू होती है और नेताओं का विश्वास डगमगाने लगता है, तब राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंताएं स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती हैं। ऐसे माहौल में राष्ट्रीय स्तर पर सहयोगी तलाशना एक व्यावहारिक राजनीतिक विकल्प बन जाता है। यही कारण है कि राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की मुलाकात को केवल एक सामान्य राजनीतिक बैठक के रूप में नहीं देखा जा रहा। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब कांग्रेस अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश कर रही है और तृणमूल कांग्रेस अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने की चुनौती से जूझ रही है। दोनों दलों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन उनकी चिंता एक जैसी है—राजनीतिक प्रासंगिकता को बनाए रखना। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के संबंधों का इतिहास भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। ममता बनर्जी स्वयं कांग्रेस की ही उपज हैं। उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी और बाद में बंगाल की राजनीति में कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ दिया। लंबे समय तक दोनों दलों के बीच प्रतिस्पर्धा और अविश्वास का माहौल रहा। कई चुनावों में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ लड़े। इसलिए आज यदि दोनों दलों के बीच संवाद बढ़ रहा है तो यह केवल वैचारिक निकटता का परिणाम नहीं बल्कि राजनीतिक आवश्यकता का संकेत भी माना जा सकता है। राजनीति में स्थायी मित्र और स्थायी शत्रु नहीं होते। परिस्थितियां बदलती हैं तो रणनीतियां भी बदलती हैं। यदि कांग्रेस को लगता है कि क्षेत्रीय दलों के साथ बेहतर तालमेल के बिना भाजपा का मुकाबला कठिन है, तो वह पुराने मतभेदों को पीछे छोड़ सकती है। इसी प्रकार यदि तृणमूल कांग्रेस को लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर अकेले आगे बढ़ना मुश्किल है, तो वह भी पुराने रिश्तों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। हालांकि किसी संभावित गठबंधन या समझौते के सामने कई चुनौतियां भी हैं। कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और उसकी अपनी संगठनात्मक संरचना है। वहीं तृणमूल कांग्रेस का पूरा राजनीतिक मॉडल ममता बनर्जी के नेतृत्व के इर्द-गिर्द विकसित हुआ है। दोनों दलों के कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच भी कई क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा रही है। ऐसे में किसी भी बड़े राजनीतिक समझौते को जमीन पर लागू करना आसान नहीं होगा। फिर भी यह तथ्य नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारतीय राजनीति में जनाधार का क्षरण दलों को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर करता है। जब राजनीतिक समर्थन घटने लगता है तो विचारधारात्मक मतभेद भी अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण हो जाते हैं और अस्तित्व का प्रश्न प्रमुख हो जाता है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की वर्तमान स्थिति को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। आज कांग्रेस अपने गौरवशाली अतीत और अनिश्चित भविष्य के बीच खड़ी है। वहीं तृणमूल कांग्रेस अपने क्षेत्रीय प्रभुत्व को बचाए रखने की चुनौती का सामना कर रही है। दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता जनता का विश्वास दोबारा अर्जित करने की है। केवल राजनीतिक समीकरणों और नेताओं की मुलाकातों से जनाधार वापस नहीं आता। इसके लिए मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व, विश्वसनीय नीतियां और जनता के मुद्दों से निरंतर जुड़ाव आवश्यक होता है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की हालिया मुलाकातों ने राजनीतिक अटकलों को जरूर हवा दी है, लेकिन इन मुलाकातों का वास्तविक महत्व आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह दौर भारतीय राजनीति में नए समीकरणों के निर्माण का है। जिन दलों ने कभी एक-दूसरे के खिलाफ अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी, वे आज बदलती परिस्थितियों के कारण संवाद की राह पर दिखाई दे रहे हैं। यह केवल दो दलों की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति के उस बड़े सत्य का उदाहरण है जिसमें जनाधार ही सबसे बड़ी शक्ति होता है। जब जनाधार मजबूत होता है तो दल आत्मविश्वास से भरे रहते हैं, लेकिन जब वह कमजोर पड़ने लगता है तो नए सहयोगियों की तलाश और पुराने रिश्तों की पुनर्स्थापना राजनीति की अनिवार्यता बन जाती है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की मौजूदा स्थिति भी इसी राजनीतिक यथार्थ को प्रतिबिंबित करती है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि ये मुलाकातें केवल राजनीतिक शिष्टाचार थीं या फिर भारतीय राजनीति में किसी नए अध्याय की शुरुआत का संकेत। (वरिष्ठ पत्रकार,साहित्यकार-स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 12 जून /2026