सनातन धर्म में प्राय: सभी भगवान कोई न कोई वस्तु धारण करते हैं। सामान्यत: ये वस्तुएँ उन्हें विशेष प्रिय लगती हैं और ये उनके व्यक्तित्व का निर्धारण भी करती है। इस लेख में कुछ प्रमुख देवताओं की प्रिय वस्तुओं का ही वर्णन किया है। १. ब्रह्माजी - वेदग्रंथ, अक्षमाला वेदग्रंथ - ये ज्ञान का प्रतीक है। वेद ग्रंथ सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ हैं। सम्पूर्ण संसार में ज्ञान का प्रचार प्रसार इनके आधार पर ही हुआ है। अक्षमाला - यह अनन्त ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। जीवन के अन्तहीन चक्र का संकेत इस माला से प्राप्त होता है। जिस प्रकार माला का चक्र चलता रहता है उसी प्रकार जीवन चक्र भी पृथ्वी पर विद्यमान है। २. विष्णुजी - शंख, चक्र, गदा, पद्म शंख - शंख ध्वनि, यह शुभता का प्रतीक है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रसारण होता है। इसकी ध्वनि ज्ञान का प्रतीक भी कही जाती है। चक्र - यह समय के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करता है। यह इस बात का संकेत देता है कि प्रत्येक कार्य समय से पूर्ण करना ही सार्थकता है। गदा - यह शक्ति का प्रतीक है। पद्म - कमल कीचड़ में रहकर भी सुन्दरता और पवित्रता से अपनी छबि बनाए रखता है। यह मानव को यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थिति में जन्म लेकर जलकमलवत् जीवन-यापन किया जा सकता है। ३. महेश (शंकर) - डमरू, त्रिशूल, गले में नाग, सिर पर अर्द्ध चन्द्र, जटा में गंगा आदि। डमरू - यह ब्रह्माण्ड के सृजन का प्रतीक है। यह ध्वनि और नाद को इंगित करता है। नृत्य संगीत और संस्कृत व्याकरण सूत्र का प्रणेता डमरू की ध्वनि को ही माना जाता है। त्रिशूल - धार्मिक ग्रंथों का कथन है कि त्रिशूल व्यक्ति के कर्म के अनुसार दंडित करता है। दैहिक, दैविक और भौतिक शक्तियों पर नियंत्रण रखता है। सनातन धर्मावलंबियों के घरों के मुख्य द्वार के ऊपर मध्य में त्रिशूल बनाने की परंपरा रही है। गले का नाम - शंकरजी के गले के नाग का नाम वासुकी है। यह अहंकार पर नियंत्रण का प्रतीक है। यह इस बात की ओर भी इंगित करता है कि मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। गले में धारण कर विषैले सर्प को भी मित्रवत धारण किया जा सकता है। अर्द्धचन्द्र - अर्द्धचन्द्र मानसिक शान्ति और समय चक्र पर नियंत्रण रखने का प्रतीक है। यह शुभता का प्रतीक भी है। गंगा नदी - मानव जीवन का प्रवाह निरन्तर बना रहे। इस बात का यह प्रतीक है। अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का सन्देश भी देती है। तीसरा नेत्र - यह नेत्र आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है। संसार की मोह माया का त्याग करके अध्यात्म की ओर अग्रसर होते रहो यही इसका सन्देश है। भस्म - भस्म से यह शिक्षा प्राप्त होती है कि अन्त में सभी को राख में परिवर्तित होना है। मृग चर्म - यह सन्देश देता है कि शिव का आधिपत्य जीवित प्राणियों पर भी है। नन्दी - आदर्श भक्तों का प्रतिनिधि है। वह शिवजी का द्वारपाल है। ४. श्री गणेशजी - अंकुश, मोदक, पाश, वरमुद्रा, मूषक अंकुश - मन पर नियंत्रण रखने का संकेत देता है। मोदक - मोदक आनन्द का प्रतीक है। घरों में जब आनन्दोत्सव होता है तो लड्डू बाँटे जाते हैं। भगवान को भी मिष्ठान्न का भोग लगाया जाता है। पाश - यह अपने आप पर बंधन रखने की ओर संकेत करता है। मनुष्य को हमेशा अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। वरमुद्रा - गणेशजी का वरमुद्रा वाला हाथ भक्तों को आशीर्वाद देता है। मूषक - यह गणेशजी का वाहन है। मन की चंचलता पर नियंत्रण रखता है। यह ज्ञान का भी प्रतीक है। ५. श्रीराम - धनुष बाण, श्याम वर्ण, तरकश, सूर्य, ú, कोविदार वृक्ष, अंकुश, कमल, वज्र, रामराज्य। धनुष बाण - वीरता, न्याय का प्रतीक, बुराई पर विजय, दायें हाथ में धनुष, बायें में बाण, पीछे तरकश। सूर्य - श्रीराम के सूर्यवंश का चिह्न है। यह चारों ओर धर्म का प्रकाश फैलाता है। ú - यह शाश्वत सत्य का प्रतीक है। यह ब्रह्म का स्वरूप भी है। अयोध्या के ध्वज पर ú का आकार बना है। कोविदार वृक्ष - अयोध्या की पुरातन राज परम्परा का प्रतीक है। अंकुश, कमल, वज्र - ये श्रीराम के चरणों में बने चिह्न हैं। ये ईश्वरीय अवतार के प्रतीक हैं। राम राज्य - सुखी शासन व्यवस्था दैहिक, दैविक भौतिक तापा, रामराज्य काहू नहीं व्यापा।ÓÓ श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड २०/१ ६. श्रीकृष्ण - बाँसुरी, मोरपंख, माखन, पीताम्बर, गौभक्ति, सुदर्शन चक्र। बाँसुरी - यह एक दिव्य संगीत वाद्य है। सभी के आकर्षण का केन्द्र भी है। इसकी ध्वनि मनमोहक है। इसके वादन से गायों के झुंड आ जाते थे। मोरपंख - सुन्दरता का प्रतीक है। भौतिक इच्छाओं से मुक्ति दिलाता है। माखन - यह भौतिक साधनों के प्रति आकर्षण का प्रतीक है। सुन्दरता और स्वाद इसका प्रमुख गुण है। सुदर्शन चक्र - यह आततायियों से रक्षा करने का सशक्त साधन है। श्रीकृष्ण ने इसे धारण किया था। ७. हनुमान जी - गदा, अष्ट सिद्धि और नवनिधि। गदा - यह शक्ति का प्रतीक है। अष्ट सिद्धि और नवनिधि - हनुमानजी इन सिद्धियों के दाता हैं। वे समय-समय पर अपने स्वरूप को आवश्यकतानुसार परिवर्तित कर लेते हैं। ८. सरस्वती देवी - पुस्तक, वीणा, स्फटिक माला, जलकलश, कमल। पुस्तक - ज्ञान का प्रतीक है। इसमें वेदों का सार निहित है। वीणा - कला, संगीत, नृत्य, लय का प्रतीक है। जगत के अंधकार को दूर कर जीवन को संगीत से रसमय बनाती है। स्फटिक माला - आध्यात्मिक चिंतन का प्रतीक है। जीवन में जप और ध्यान भी आवश्यक है। इस बात की ओर इंगित करती है। जल कलश - यह शकुन और पवित्रता का प्रतीक है। कमल - सरस्वती पद्मासन पर विराजमान है। उन्हें कोमल, मुलायम स्थान पर बैठना पसंद है। ९. लक्ष्मी - सोने के सिक्के, कमल फूल, वरद मुद्रा। सोने के सिक्के - यह सुदृढ़, आर्थिक व्यवस्था का प्रतीक है। अपने भक्तों को इंगित करती है कि स्वर्ण भी जीवन में उपयोगी है। लक्ष्मी पूजन करने से इन्हें प्राप्त करने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कमल फूल - लक्ष्मीजी अपने दो हाथों में कमल पुष्प धारण करती है। कमल अपनी सुन्दरता और निस्पृहता का प्रतीक है। वरमुद्रा - लक्ष्मीजी अपने भक्तों को वरदान प्रदान करती है, जिससे वे सुखी और सम्पन्न जीवन जी सके। १०. विभिन्न नौ देवियाँ - खड्ग, खप्पर, तलवार, मुण्डमाला, खड्ग-खप्पर, तलवार तथा मुण्डमाला ये सभी वस्तुएँ, सनातन धर्म की विभिन्न नौ देवियाँ धारण करती हैं। इनसे यह सन्देश प्राप्त होता है कि मातृभक्ति और मातृशक्ति को सर्वदा आत्मरक्षा का ध्यान देना चाहिए। संकट के समय उन्हें सर्वदा सतर्क रहना चाहिए। नई पीढ़ी को विभिन्न देवताओं द्वारा धारण की जाने वाली वस्तुओं के बारे में जानकारी होनी चाहिए, जिससे वे यह समझ सकें कि धारण की कई वस्तु अति महत्वपूर्ण है। वे वस्तुएँ निरर्थक नहीं है और जीवन में उपयोगी हैं। (यह लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 12 जून /2026