-19 सांसदों और 64 विधायकों के बागी होने से टीएमसी में संकट कोलकाता(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट से जूझ रही है। पार्टी के भीतर असंतोष इस कदर बढ़ चुका है कि लोकसभा से लेकर राज्यसभा और विधानसभा तक, ममता बनर्जी के खिलाफ उनके अपने ही नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को सामने आई एक सूची ने राज्य की सियासत में हड़कंप मचा दिया है, जिसमें टीएमसी के 19 लोकसभा सांसदों के नाम शामिल हैं। इस सूची में टीएमसी के कई बड़े और चर्चित चेहरे शामिल हैं, जिनमें सायोनी घोष, पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हलदार, डॉ. शर्मिला सरकार, प्रसून बंद्योपाध्याय, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार माल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी, जून मलिया और पार्थ भौमिक के नाम बताए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, लंबे समय से 20 सांसदों के अलग गुट बनाने की अटकलें थीं, और केवल एक वरिष्ठ सांसद के फैसले के इंतजार में यह सूची रुकी हुई थी। दावा किया जा रहा है कि इन 19 बागी सांसदों ने मई महीने में ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपना एक साझा समर्थन पत्र सौंप दिया था। हालांकि, यह अभी पूरी तरह साफ नहीं है कि यह गुट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल होगा या अपनी अलग राह चुनेगा। सिर्फ लोकसभा ही नहीं, राज्यसभा में भी ममता बनर्जी की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। उच्च सदन में महज चार दिनों के भीतर पार्टी को बड़ा झटका लगा है, जब कोयल मलिक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वह पिछले कुछ दिनों में इस्तीफा देने वालीं चौथी राज्यसभा सांसद हैं। उनसे पहले सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश बरेक भी संसद सदस्यता छोड़ चुके हैं। सुखेंदु शेखर रे ने तो पार्टी के सभी पदों से भी दूरी बना ली है। इन इस्तीफों के बाद राज्यसभा में टीएमसी सांसदों की संख्या घटकर अब सिर्फ 9 रह गई है, जिससे पार्टी की ताकत काफी कमजोर हो गई है। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर भी बगावत की आग तेजी से फैल रही है। बागी गुट का नेतृत्व कर रहे रिताब्रता बनर्जी का दावा है कि उनके साथ आने वाले विधायकों की संख्या अब बढ़कर 64 हो चुकी है। गौरतलब है कि टीएमसी ने विधानसभा चुनाव में 80 सीटों पर जीत हासिल की थी। अगर रिताब्रता बनर्जी का यह दावा पूरी तरह सही साबित होता है, तो ममता बनर्जी के साथ केवल 16 विधायक ही रह जाएंगे, जिससे राज्य सरकार के अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगेगा। इस भारी उठापटक के बीच अब यह कयास लगाए जा रहे हैं कि बागी सांसदों और विधायकों का यह समूह जल्द ही भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) का रुख कर सकता है। यह गुट चुनाव आयोग के सामने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में मान्यता देने की मांग रख सकता है। यदि आयोग इस बागी गुट के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो ममता बनर्जी के हाथ से न सिर्फ पार्टी का नाम बल्कि उसका आधिकारिक चुनाव चिह्न भी छिन सकता है। इससे पहले महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ भी ऐसा ही घटनाक्रम देखने को मिल चुका है, जहां मूल नेतृत्व को अपनी ही पार्टी के नाम और चिह्न से हाथ धोना पड़ा था। वीरेंद्र/ईएमएस/12जून2026