12-Jun-2026
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-शीर्ष अदालत ने कहा— बर्खास्तगी सबसे कठोर सजा, इसका उपयोग केवल गंभीर भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण या संस्थान को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में हो नई दिल्ली,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी कर्मचारी को केवल अनुशासनहीनता, आदेशों की अवहेलना या वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश न मानने के आधार पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा केवल उन मामलों में दी जानी चाहिए, जहां भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण, वित्तीय अनियमितता या नियोक्ता को गंभीर नुकसान पहुंचाने वाली हरकतें साबित हों। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि कार्यस्थल पर अनुशासन का महत्व निर्विवाद है, लेकिन अनुशासनहीनता के हर मामले में नौकरी से निकालना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार, अवैध लाभ प्राप्त करना, फंड का दुरुपयोग, संगठन की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना या नियोक्ता को प्रत्यक्ष क्षति पहुंचाने जैसे गंभीर मामलों के अभाव में कर्मचारी को सेवा से हटाना अत्यधिक कठोर कदम होगा। अदालत के अनुसार, किसी भी सजा का संबंध कर्मचारी के कृत्य की गंभीरता, उसके पूर्व सेवा रिकॉर्ड, परिस्थितियों और संस्थान पर पड़े प्रभाव से होना चाहिए। यह टिप्पणी महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड के एक कर्मचारी को वर्ष 2017 में सेवा से बर्खास्त किए जाने के आदेश को निरस्त करते हुए की गई। अदालत ने कहा कि बर्खास्तगी कर्मचारी और नियोक्ता के संबंधों को स्थायी रूप से समाप्त कर देती है तथा कर्मचारी को सेवानिवृत्ति और अन्य सेवा लाभों से भी वंचित कर देती है। पीठ ने यह भी कहा कि ऐसे निर्णयों का प्रभाव केवल कर्मचारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार की आर्थिक सुरक्षा और भविष्य भी प्रभावित होता है। न्यायमूर्ति एन. के. सिंह ने कहा कि नौकरी से निकाले जाने का दाग व्यक्ति के सेवा रिकॉर्ड पर स्थायी रूप से दर्ज हो जाता है, जिससे भविष्य में रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं, विशेषकर सरकारी सेवाओं, सार्वजनिक उपक्रमों और अन्य विनियमित संस्थानों में। अदालत ने कर्मचारी की 21 वर्षों की सेवा को ध्यान में रखते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि कथित अनुशासनहीनता, आदेशों की अवहेलना और सरकारी दस्तावेजों के नष्ट किए जाने के आरोपों के संदर्भ में दी जाने वाली सजा पर पुनर्विचार किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि बर्खास्तगी का दंड केवल अत्यंत गंभीर मामलों के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए, जहां सहानुभूति या नरमी की कोई गुंजाइश न हो। हिदायत/ईएमएस 12जून26