राष्ट्रीय
13-Jun-2026
...


नई दिल्ली (ईएमएस)। पुरातत्व वैज्ञानिकों की एक दुर्लभ खोज ने ओडिशा राज्य के प्रारंभिक मध्यकालीन इतिहास और सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं के कई नए राज खोले हैं। वैज्ञानिकों ने ओडिशा के मयूरभंज जिले में सिमलीपाल बायोस्फीयर रिजर्व की तलहटी में स्थित आकर्शिला नामक स्थल पर 7वीं-8वीं शताब्दी की शैल नक्काशी (रॉक एनग्रेविंग्स) की खोज की है। ये नक्काशी सदियों पहले के लोगों के विचारों, उनके पहनावे और दुनिया को देखने के उनके नजरिए को समझने का एक सीधा जरिया हैं, जो अतीत की कहानियों को वर्तमान से जोड़ते हैं। पुरातात्विक विभाग की इस महत्वपूर्ण सफलता में एक्सपर्ट्स ने प्राकृतिक चट्टानों की सतहों पर सीधे उकेरी गई आकृतियां मिली हैं, जिनमें मनुष्यों, जानवरों की आकृतियां, प्रतीकात्मक चिह्न और शिलालेख शामिल हैं। यह वह दौर था जब गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद और बाद के मध्यकालीन साम्राज्यों के उदय से पहले क्षेत्रीय राजवंश कला, धर्म और समाज को एक नया आकार दे रहे थे। यहां मिले साक्ष्य प्राचीन काल में सूर्य पूजा और अन्य धार्मिक प्रथाओं की ओर इशारा करते हैं। रिसर्चर्स ने ऐसी नक्काशी भी देखी है जो उस दौर के पहनावे, दैनिक जीवन के साथ ही मानव और प्रकृति के बीच के संबंधों को उजागर करती है। इस स्थल पर एक दिलचस्प नक्काशीदार पत्थर की मूर्ति भी मिली है, जो देखने में भगवान गणेश की तरह ही लग रही है। स्थानीय लोग आज भी यहां सिंदूर, तेल लगाकर और धूप-अगरबत्ती जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एक हजार से अधिक सालों से चली आ रही सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं आज भी बिना टूटे जारी हैं। यहां के दस्तावेजों के अनुसार यह नक्काशी लगभग 500 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। शिलालेखों में दिखाई देने वाली लिपि ने इतिहासकारों का ध्यान खींचा है, क्योंकि यह पूर्वी भारतीय परंपराओं से जुड़ी शुरुआती लिपियों से काफी मेल खाती है। यह खोज प्रारंभिक मध्यकालीन भारत की समझ को और अधिक गहरा करती है, जो इस क्षेत्र के सांस्कृतिक और धार्मिक विकास पर नई रोशनी डालती है। मयूरभंज और उसके आसपास की बूढ़ाबलंगा नदी घाटी प्रागैतिहासिक उपकरणों, प्राचीन बस्तियों और शुरुआती ऐतिहासिक स्थलों के लिए लंबे समय से जानी जाती रही है। हालांकि, अब तक इस विशेष घाटी में किसी बड़े शैल कला स्थल की सूचना नहीं मिली थी। आकर्शिला की इस खोज ने उस कमी को पूरा कर दिया है और क्षेत्र में पाषाण काल के अवशेषों तथा प्रारंभिक मध्यकालीन काल के बीच की कड़ियों को सफलतापूर्वक जोड़ा है। यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र हजारों सालों से मानवीय गतिविधियों का केंद्र रहा है और इसने विभिन्न संस्कृतियों को पनपने का अवसर दिया है। पास में स्थित सिमलीपाल बायोस्फीयर रिजर्व भारत के प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों में से एक है, जो बाघों, हाथियों और अलग-अलग प्रकार के जंगलों का घर है। यहां प्राचीन मानवीय निशान मिलना यह दर्शाता है कि यह इलाका केवल वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि हजारों सालों से इंसानों और उनकी संस्कृति का भी आश्रय स्थल रहा है। शैल नक्काशी, जिसे आसान भाषा में पेट्रोग्लिफ भी कहा जाता है, पत्थरों पर उकेरी गई प्राचीन कहानियां या चित्र हैं। यह कोई चित्र नहीं है, बल्कि इन्हें चट्टान की सतह को काटकर या हथौड़े से तराश कर बनाया जाता है। सुदामा/ईएमएस 13 जून 2026