लेख
09-Jun-2023
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जिस उम्र में हम डरते-डरते साइकिल सीख रहे थे, उस वय के बच्चों को करतब करते हुए मोटरसाइकिल चलाते देख आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। मोबाइल और लैपटाप पर सधे अंदाज में चलती उनकी अंगुलियां भी कम हैरतअंगेज नहीं हैं। यहां क्या नहीं है? खोजने पर शेक्सपियर, गोर्की, बालजाक, लुइस कैरोल से लेकर प्रेमचंद, प्रसाद, सुभद्राकुमारी चौहान, दिनकर, सत्यजित रे, गुलजार, बच्चन का वैविध्यपूर्ण मोहक साहित्य मिल जाएगा। यहां एनीमेशन है, तो भूत-प्रेत की डरावनी दुनिया भी! खौफनाक कारनामों भरे वीडियो गेम, कार्टून, जुआ के साथ-साथ गेमरों-हैकरों की बेसिर-पैर की कहानियां भी मिलेंगी। तीन दशक पहले टीवी, फिर वीडियो गेम और अब मोबाइल-लैपटाप के जरिए असीमित डेटा वाले इंटरनेट ने आज के बच्चों को व्यस्त रखने का ऐसा इंतजाम कर दिया है कि खेल का मैदान और किताबें उनसे दूर चली गई हैं। कभी सफदर हाशमी ने एक कविता लिखी थी- ‘किताबें कुछ कहना चाहतीं हैं’। इसमें पुस्तकों की सार्थकता को कई स्तरों पर रेखांकित किया गया था। मगर आज की तारीख में… किताबों की बातें बीते जमानों की, दुनिया के इंसानों की, आज और कल की, खुशियों और गमों की- सब एक गूगल में समाहित है। कितने लकदक और बड़े संसार में जी रहे हैं आज के बच्चे! मगर ये उदास हैं। धमा-चौकड़ी, शरारतें, ठिठोलियां, खिलंदड़ापन- यह सब तो बचपन का हिस्सा है। इसका न होना भी कैसा बचपन! नपा-तुला व्यवहार, ओढ़ी हुई गंभीरता, अकेलेपन से घिरे और सपनों की चमक से खाली आंखें..। कुछ तो गड़बड़ लगता है। हमारे अपने बचपन में आज जैसी जगमग स्थिति नहीं थी, मगर खुशियों की बेशुमार धड़कनें समाहित थीं। बसवाड़ियों और पोखरों से भरा गांव, जिसके आखिर में घनी अमराइयां और आगे आसमान नीचे आकार धरती को ढक लेता था। छोटी-सी दुनिया और उससे जुड़ी हमारी ढेर सारी जिज्ञासाएं… इसके लिए हमारे मां-बाबूजी तो थे ही! दादा-दादी, काका-काकी और भाई-भौजाई की पूरी जमात थी। इनमें जो भी फुर्सत में होता, उससे हम अपनी बात कह सकते थे। यहां तक कि पड़ोस के बड़े-बुजुर्ग भी हमारा मार्गदर्शन करने में पीछे नहीं रहते थे। सर्दियों में अलाव के आसपास किस्से-कहानियों की दुनिया आबाद हो जाती थी। कुछ कहानी तो पूरी की पूरी गाकर सुनाई जाती थी। इन कहानियों को सुनते हुए हमारा मन हर्ष, विषाद, रहस्य-रोमांच और ‘अब क्या होगा’ की जिज्ञासा से भरा खूब सजग रहता था। कहावतों में छिपी कहानी, लोरी, खेलगीत, कठबैठी, बुझौवल (पहेली) जैसी ढेरों लोक विधाएं हमारे मनोरंजन के लिए गली-गली में बिखरी पड़ी थीं। कठबैठी और बुझौवल का हल निकालने में खूब दिमागी कसरत करनी पड़ती थी। हमारे बचपन में जो सबसे बड़ी चीज थी, वह थी लोक जीवन की सांस्कृतिक धड़कनें और समुदाय के बीच सघन संवाद। मेले और त्योहार हमारे जीवन में सामुदायिक उल्लास के अवसर ले आते थे। हम मिल-जुलकर खूब खेलते थे। आज शहर से गांव तक सामूहिकता और संवाद की दुनिया का लोप हो चुका है। बच्चा ठीक से बोलना भी नहीं शुरू करता कि करिअर की लंबी दौड़ का घोड़ा बनाया जाने लगता है। वह बाहर जाकर बच्चों में खेलना चाहता है, मगर मां उसे नर्सरी की अंग्रेजी कविताएं रटवाती है, ताकि उसका अच्छे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में दाखिला हो जाए। तीन साल का बच्चा बस्ते में मां-बाप की महत्त्वाकांक्षा ढोने के लिए मजबूर हो जाता है। विद्यालय, होमवर्क और कोचिंग के बीच पेंडुलम बने बच्चे खेल के मैदान, दादी-नानी की कहानियों, सहपाठियों की आपसी धींगामुश्ती, शरारतों और बाल साहित्य से दूर जा चुके हैं। हां, इनके पास मोबाइल, टीवी और रिमोट है। बच्चों की पहुंच में अब वह सब भी है, जो अभी उन्हें नहीं दिखना चाहिए! यह देखने में आ रहा है कि पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा की सान पर चढ़े आज के बच्चे संवेदना खो रहे हैं। इनके मन से कोमलता, निश्छलता, सहजता, भोलापन, रागात्मकता, चंचलता की वृत्ति विरल होती जा रही है। इन बच्चों में अनियंत्रित उत्तेजना, आक्रोश, हिंसा और आक्रामकता बढ़ रही है। आज के कुछ बच्चे कई बार क्रोध में पागल होकर सहपाठी, अध्यापक, प्राचार्य, यहां तक कि मां-बाप पर जानलेवा हमला करने लगे हैं। दरअसल, निजी क्षेत्र की शिक्षा मूलत: शिक्षा की मुख्यधारा में एक नकारात्मक हस्तक्षेप है। पढ़ाई हमारे समय में भी थी, लेकिन ऐसी जी हलकान करने वाली नहीं! शिक्षाविद अब महसूस करने लगे हैं कि बच्चों को अगर कल का बेहतर नागरिक बनाना है, संवेदनशील मनुष्य के रूप में ढालना है, उसके अंदर सामाजिकता और सामुदायिकता के गुणों की पुनर्स्थापना करनी है तो शिक्षा, खेल और बाल साहित्य के बीच जो दूरी बढ़ गई है, उसे खत्म करना होगा। हमें बच्चों को ऐसा महौल देना होगा, जहां बच्चे पढ़ें कम और सीखें ज्यादा। खेलें-कूदें और रचनात्मक बनें। (विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट पंजाब) ईएमएस / 09 जून 23