लेख
28-Aug-2025
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- कॉर्पोरेट वार का असर राजनीति एवं व्यापार में भारत की राजनीति और कॉर्पोरेट जगत का रिश्ता हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। उद्योगपतियों और सत्ता के बीच के समीकरणों ने कई बार सरकार की नीतियों को प्रभावित किया है। मौजूदा दौर में यह रिश्ता केवल व्यापारिक एवं राजनीतिक समीकरणों तक सीमित नहीं रहा। बल्कि सीधी टकराहट की शक्ल लेता हुआ दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा वंतारा जू मामले में एसआईटी का गठन और उसमें वित्तीय व कानूनी अनियमितताओं की जांच का जो आदेश दिया है उसके बाद यह टकराव सतह पर आ गया है। अनिल अंबानी के घर और कार्यालयों में ईडी और सीबीआई के छापे वर्चस्व की लड़ाई के रूप में देखे जा रहे है। मुकेश अंबानी का नाम भारत में सबसे प्रभावशाली कॉर्पोरेट घराने के रूप में लिया जाता है। यह भी कहा जाता है, 2012 में मुकेश अंबानी के कारण ही भारत के राजनीति की दिशा बदली। प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का नाम सामने आया। उस समय कॉरपोरेट जगत और अमेरिका ने वैश्विक व्यापार संधि को लेकर जो अवरोध भारत में बने थे। उसको ठीक करने के लिए अमेरिका की सरपरस्ती और रिलायंस की ताकत के बल पर 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे। रिलायंस समूह दूरसंचार से लेकर पेट्रोलियम और रिटेल तक हर क्षेत्र में फेला हुआ है। जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा थे उसे समय मुकेश अंबानी का व्यापार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी तेजी के साथ फैला था। मुकेश अंबानी और रिलायंस समूह की राजनीतिक प्रशासनिक एवं न्यायपालिका से नजदीकियां हमेशा सुर्खियों में रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार रिलायंस के मंच पर पंहुंचे। जियो लॉन्च से लेकर अस्पताल उद्घाटन के कार्यक्रम में मोदी पहुंचे। अब तस्वीर तेजी के साथ बदल रही है। अदालत के हस्तक्षेप और जांच एजेंसियों की सक्रियता ने संकेत दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुकेश अंबानी के संबंध इन दिनों ठीक नहीं चल रहे हैं। कॉर्पोरेट ताकत पर सियासी नियंत्रण का दौर शुरू हो गया है। इसके पीछे जो मुख्य कारण बताया जा रहा है उसमें ट्रंप के नजदीकी सलाहकार के रूप में मुकेश अंबानी ने अपनी भूमिका तय कर ली है वहीं गौतम अडानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफी नजदीक हैं। टैरिफ बार को लेकर ट्रंप और मोदी जी के बीच में जो तनातनी चल रही थी। उसमें मोदी जी को शायद लगता था, मुकेश अंबानी उनकी मदद करेंगे। लेकिन मुकेश तटस्थ रहे, यह तटस्थता गौतम अडानी को लेकर थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में जिस तरह से गौतम अडानी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर तरह का समर्थन दिया है। उसके बाद से ही रिलायंस समूह की दूरियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दिखने लगी थी। अडानी समूह, रिलायंस समूह से आगे निकलने की दौड़ में आ गया था। दरअसल, यह टकराव महज व्यापारिक, कानूनी या प्रशासनिक नहीं है। इसके पीछे राजनीति की भी बड़ी मजबूरियां हैं। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है, सत्ता और कॉर्पोरेट का गठजोड़ भारत के लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है। ऐसे समय यदि सत्ता ही कॉर्पोरेट को कठघरे में खड़ा करने लगेगी। इससे यह संदेश जाता है, कि सरकार अब कॉरपोरेट से अपनी दूरी बनाकर पल्ला झाड़ना चाहती है। अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इस संघर्ष को नया आयाम मिला है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान सस्ते तेल से रिलायंस को हुए मुनाफे पर वैश्विक स्तर पर अमेरिका ने चुप्पी साध रखी है। वही अडानी सहित भारत की अन्य कंपनियों पर अमेरिका ने टैरिफ और प्रतिबंध लगाए हैं। यूरोप की अन्य एजेंसियां भी तेल के कारोबार और मुनाफे पर नजर गड़ाए हुए हैं। भारत सरकार पर दबाव है, वह खुद को वैश्विक मंच पर पारदर्शी रखे। मुकेश अंबानी की ट्रंप के साथ विगत महीनो में नजदीकियां काफी बढ़ गई है। ट्रंप भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी पर शिकंजा कस रहे हैं। टैरिफ के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में रिलायंस जैसी बड़ी कंपनी पर सरकार द्वारा जो कार्रवाई की जा रही है। उसे वर्तमान सत्ता की मजबूरी और रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सबसे अहम सवाल यह है, क्या कॉर्पोरेट साम्राज्य वाकई सत्ता को चुनौती देने की स्थिति में है। सत्ता क्या कॉर्पोरेट जगत को सीमाओं में बांधने की स्थिति में है? भारत की राजनीति पिछले 2 दशकों से पूंजी और कारपोरेट के गठजोड़ पर टिकी है। पहली बार यह गठजोड़ डगमगाता हुआ नजर आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार 12 सितंबर तक वन्य तारा की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की जाना है। सुप्रीम कोर्ट में 15 सितंबर को इस मामले की अदालत में सुनवाई की तारीख निश्चित है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा, यह टकराव केवल प्रतीकात्मक है। या वास्तव में भारत की राजनीति और कॉर्पोरेट संबंधों में नया अध्याय लिखा जाएगा। भारत में जिस तरह की स्थिति वर्तमान बनी हुई है। उसमें एक ओर मुकेश अंबानी और गौतम अडानी हैं। अंतरराष्ट्रीय और भारत के संबंधों को लेकर एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। इसके बाद सबसे ज्यादा चर्चाओं में अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर हैं। जिनके इर्द-गिर्द भारत की राजनीति व्यापार और सैन्य समीकरण को लेकर क्या स्थिति बनेगी। इसको लेकर अभी कुछ कह पाना मुश्किल है। फिर भी जो हालात देश में बन रहे हैं। वह भारत के लिए कहीं से भी अच्छे नहीं कहे जा सकते हैं। भारत एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इसमें कुछ हो सकता है। ईएमएस / 18 अगस्त 25