-पलायन पानी, खाने की कमी से हुई मौतें, सभ्यता के पतन का कारण बनीं नई दिल्ली,(ईएमएस)। प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता अपनी उन्नत शहरी संरचना, जल निकासी प्रणाली और धातु के इस्तेमाल के लिए जानी जाती थी। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल और राखीगढ़ी जैसे स्थल इसकी ऐतिहासिक पहचान हैं। लंबे समय से इतिहासकार और पुरातत्वविद यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर इतनी उन्नत सभ्यता अचानक गायब क्यों हो गई। अब आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि लंबे समय तक पड़ने वाले सूखे ने इस सभ्यता को नष्ट कर दिया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शोध का नेतृत्व करने वाले शोधकर्ता ने बताया कि सिंधु घाटी के लोग सिंधु नदी के पानी पर निर्भर थे और खेती उनकी प्रमुख आजीविका थी। रिसर्च के मुताबिक मौसम और मॉनसून में बदलाव से बारिश में 10 से 20 फीसदी की कमी आई और औसत तापमान 0.5 डिग्री बढ़ गया। 85 सालों में कम से कम चार गंभीर सूखे पड़े, जिनमें एक तो 164 सालों तक चला। इन सूखों के चलते नदियां और झीलें सूखने लगीं। पानी की कमी ने कृषि को प्रभावित किया, जिससे लोग गेहूं और अन्य अनाज छोड़कर दूसरी फसलों की खेती करने की कोशिश करते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली। अध्ययन से पता चला कि उत्तरी अटलांटिक में तापमान घटने से मॉनसून कमजोर हुआ और प्रशांत व हिंद महासागर के बढ़ते तापमान ने भी बारिश को प्रभावित किया। धीरे-धीरे सिंधु घाटी के बड़े शहर छोटे-छोटे कबीलों में बंट गए। पानी की कमी, कृषि की असफलता और खाद्यान्न की कमी ने इस सभ्यता का पतन कर दिया। रिसर्च की गई रिपोर्ट से पता चला कि पतन अचानक नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे सभ्यता का स्वरूप बदलता गया। लोग पलायन करने लगे, कई लोगों की मौत हो गई और आबादी कम होती चली गई। शहरों की उन्नत संरचनाएं धीरे-धीरे वीरान हो गईं और सभ्यता का सामूहिक जीवन खत्म हो गया। इस शोध से यह साफ होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का नाश प्राकृतिक कारणों से हुआ, जिसमें लगातार सूखे और जल संकट की अहम भूमिका थी। यह अध्ययन प्राचीन सभ्यताओं की व्यवहारिकता और पर्यावरणीय कारकों के प्रभाव को समझने में अहम साबित होता है। सिराज/ईएमएस 30नवंबर25