-इस साल होने हैं 6 राज्यों में विधानसभा चुनाव साल 2026 भारतीय राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। यह वर्ष केवल कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाला समय यह भी तय करेगा, राष्ट्रीय राजनीति की धुरी किस दिशा में घूमेगी। एक ओर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अपने सियासी विस्तार को दक्षिण और पूर्वी भारत तक फैलाने के इरादे से चुनाव मैदान में उतर रही है, दूसरी ओर कांग्रेस के सामने अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को दोबारा हासिल करने की चुनौती है। इसके साथ वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस एवं अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के लिए भी 2026 का वर्ष किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। बीजेपी के लिए 2026 इसलिए अहम है, क्योंकि जिन पांच राज्यों—असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी—में चुनाव होने हैं, उनमें से केवल असम में उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार, और पुडुचेरी में वह सहयोगी दलों के सहारे सत्ता में है। असम में बीजेपी पिछले दस वर्षों से सत्ता में है। अब उसके सामने जीत की हैट्रिक लगाने की चुनौती है। हालांकि यह राह आसान नहीं दिख रही है। कांग्रेस ने गौरव गोगोई के नेतृत्व में राज्य में नई ऊर्जा दिखाई है, जिससे असम में मुकाबला कड़ा होने की संभावना है। कांग्रेस असम में मजबूत प्रदर्शन करती है, तो बीजेपी की पूर्वोत्तर रणनीति को बड़ा झटका लग सकता है। पुडुचेरी में भी एनडीए सरकार की स्थिति अस्थिर मानी जा रही है। आंतरिक कलह और कमजोर जनाधार के कारण यहां सत्ता में वापसी बीजेपी के लिए कठिन हो सकती है। वहीं पश्चिम बंगाल में दशकों से कमल खिलाने का सपना अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। ममता बनर्जी की बंगाल की सत्ता पर मजबूत पकड़ है। बीजेपी घुसपैठ और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को उठाकर माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। बंगाली अस्मिता और मुस्लिम वोट बैंक ममता के लिए बड़ी ताकत हैं। दक्षिण भारत बीजेपी के लिए अभी भी सबसे बड़ी चुनौती है। तमिलनाडु और केरल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता उत्तर भारत जैसी असरदार नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में बीजेपी का खाता नहीं खुलना, इस सच्चाई को रेखांकित करता है। यहां भाजपा अपने गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर है। केरल में बीजेपी तीसरे विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रही है। तिरुवनंतपुरम के निकाय चुनाव में मिली सफलता से भाजपा का उत्साह जरूर बढ़ा है। केरल की पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीति को तोड़ना अभी भी भाजपा के लिए कठिन है। कांग्रेस के लिए 2026 में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें वह केवल तमिलनाडु की डीएमके की जूनियर पार्टनर के रूप में शामिल है। भारत जोड़ो यात्रा के बाद 2024 में कांग्रेस ने वापसी के संकेत दिए थे। 2025 में पार्टी फिर से संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक मतभेदों से जूझ रही है। 2026 में भी कांग्रेस ठोस जीत दर्ज नहीं कर पाती, तो उसका राष्ट्रीय विकल्प बनना और मुश्किल हो जाएगा। कांग्रेस की उम्मीद केरल और असम से जुड़ी हैं। केरल में यूडीएफ और एलडीएफ के बीच सीधा मुकाबला है। कांग्रेस के भीतर, नेतृत्व को लेकर खींचतान उसकी राह कठिन बना रही है। गुटबाजी और मुख्यमंत्री पद को लेकर अटकलें केरल में कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती हैं। असम में कांग्रेस वापसी की कोशिश कर रही है। वाम दलों के लिए 2026 अस्तित्व की लड़ाई है। बंगाल और त्रिपुरा से सत्ता गंवाने के बाद अब केवल केरल ही उनका आखिरी मजबूत गढ़ बचा है। यदि केरल में वाम की हार होती है, तो राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथ की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो जाएंगे। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के लिए भी यह चुनाव आसान नहीं है। पंद्रह साल की सत्ता के बाद सत्ता विरोधी लहर, बीजेपी का आक्रामक अभियान और कांग्रेस-वाम गठजोड़ की चुनौती— इन सब से निपटना उनके लिए यह चुनाव बड़ी परीक्षा होगी। तमिलनाडु में डीएमके का गढ़ फिलहाल मजबूत नजर आता है। जयललिता के बाद एआईएडीएमके का बिखराव और आंतरिक संघर्ष मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के लिए राहत है। हालांकि पांच साल की सत्ता के बाद उभरने वाला असंतोष और बीजेपी के प्रयास विपक्ष को नई ऊर्जा दे सकते हैं। कुल मिलाकर, 2026 सिर्फ चुनावी वर्ष नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की नई दिशा तय करने वाला पड़ाव है। केन्द्र सरकार के सामने जिस तरह से आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के अंदर भी नेतृत्व को लेकर संघ और संगठन के बीच मतभेद अभर कर सामने आ रहे हैं। बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी और कर्ज के बोझ से आम जनता दबी हुई है। जन-रोष सारे देश में विभिन्न मांगों को लेकर सड़कों पर आ रहा है। 2014 में जो वादे भाजपा ने किए थे, अच्छे दिनों का जो सपना दिखाया था, वह सब जुमले साबित हुए हैं। मुस्लिम- ईसाई एवं हिन्दू धार्मिक धुव्रीकरण को लेकर आम जनता के बीच हिन्दू धार्मिक धुव्रीकरण परवान नहीं चढ़ रहा है। पिछले 10 साल में आम जनता पर टेक्स और जुर्माने का बोझ बढ़ाया है। मनरेगा योजना को राज्यों के ऊपर डाल दिया गया है। 40 फीसदी अंशदान राज्य सरकारों को करना होगा। राज्य सरकारें कर्ज में हैं। 85 फीसदी राज्यों का राजस्व, वेतन, पेंशन एवं अन्य योजनाओं में खर्च हो रहा है। विकास के काम बंद हो रहे हैं। इन सबसे भाजपा के प्रति लोगों में नाराजी बन रही है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को चुनौती मिल रही है। न्याय पालिका के प्रति भी लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है। इसका असर मौजूदा साल 2026 में देखने को मिलेगा। सत्ता पक्ष, विपक्ष एवं क्षेत्रीय दलों के लिए यह साल चुनौतीपूर्ण है। आम जनता की परेशानी भी बढ़ रही है। 2026 सभी के लिए चुनौती भरा है। सभी ओर अनिश्चतता देखने को मिल रही है। ईएमएस/03/01/2026