नई दिल्ली (ईएमएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने अजमेर शरीफ दरगाह में प्रधानमंत्री की ओर से चादर चढ़ाने की परंपरा के विरोध में दायर याचिका को खारिज कर दिया है। यह याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह और हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर राज्य-प्रायोजित औपचारिक सम्मान, जैसे चादर चढ़ाना, भारतीय संविधान के मूल्यों, राष्ट्रीय संप्रभुता और जनता की इच्छा के विरुद्ध है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि चूंकि संबंधित मौके पर चादर पहले ही चढ़ाई जा चुकी है, इसलिए यह मामला अब निरर्थक हो गया है। साथ ही, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह ऐसा विषय नहीं है जिस पर न्यायिक निर्णय दिया जा सके। अदालत के अनुसार, यह परंपरा कार्यपालिका के क्षेत्र से जुड़ी है और इसमें हस्तक्षेप करना न्यायालय का कार्य नहीं है। याचिका में दावा किया गया था कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती 12वीं शताब्दी में शहाबुद्दीन गोरी के आक्रमणों के दौरान भारत आए थे और उनका संबंध विदेशी आक्रमणों, दमन तथा धर्मांतरण से था। याचिकाकर्ताओं ने इसे भारत की सभ्यतागत परंपराओं और संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और राष्ट्रीय अखंडता—के विपरीत बताया। गौरतलब है कि अजमेर शरीफ दरगाह पर औपचारिक चादर चढ़ाने की परंपरा वर्ष 1947 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने शुरू की थी, जिसे बाद के प्रधानमंत्रियों ने भी निभाया। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के साथ यह स्पष्ट हो गया है कि ऐसी परंपराओं को लेकर उठने वाले राजनीतिक या वैचारिक विवादों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं हैं। आशीष दुबे / 05 जनवरी 2026